ईरान में खामनेई का तख्तापलट! भारत के लिए ‘मास्टरस्ट्रोक’ या बड़ा घाटा? चाबहार पोर्ट और व्यापार पर पड़ेगा ये असर
Iran India Trade: ईरान में जारी हिंसक प्रदर्शनों के बीच अयातुल्ला खामनेई के तख्तापलट की आशंका बढ़ गई है। जानें भारत के रणनीतिक हितों, चाबहार पोर्ट और द्विपक्षीय व्यापार पर इसका क्या प्रभाव पड़ सकता है।
- Written By: अमन उपाध्याय
भारत-ईरान संबंध, फोटो (सो. एआई डिजाइन)
India-Iran relations: ईरान में जारी राजनीतिक अस्थिरता के बीच सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामनेई की सत्ता भविष्य को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। यदि खामनेई सत्ता से बाहर होते हैं तो इसका प्रभाव केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि इसके दूरगामी असर भारत के आर्थिक और रणनीतिक हितों पर भी दिखाई देंगे। इस संभावित बदलाव से भारत के सामने दो तरह की परिस्थितियां उभर सकती हैं कुछ फायदेमंद तो कुछ नुकसानदेह दोनों हो सकती हैं।
इतिहास और पाकिस्तान का फैक्टर
भारत के लिए ईरान के साथ संबंधों का इतिहास हमेशा सरल नहीं रहा है। 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान ईरान ने पाकिस्तान को हथियारों की आपूर्ति की थी और पाकिस्तान को मान्यता देने वाला वह पहला देश था। हालांकि, आज स्थितियां बदल चुकी हैं। जनवरी 2024 में ईरान ने पाकिस्तान के बलूचिस्तान में मिसाइल हमले किए जिसके जवाब में पाकिस्तान ने भी तेहरान से अपने राजदूत वापस बुला लिए थे। वर्तमान में भारत और ईरान के बीच रणनीतिक साझेदारी ऊर्जा और क्षेत्रीय स्थिरता पर टिकी है।
चाबहार पोर्ट: भारत की सबसे बड़ी चिंता
भारत के लिए ईरान में सत्ता परिवर्तन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू चाबहार पोर्ट है। यह बंदरगाह भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच प्रदान करता है। वर्तमान में, भारत इसे एक लंबे समझौते के तहत संचालित कर रहा है, जिसे अमेरिका से अप्रैल तक प्रतिबंधों में छूट मिली हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि खामनेई सत्ता से हटते हैं और नई सरकार के अमेरिका के साथ संबंध सुधरते हैं, तो इस छूट के और बढ़ने की संभावना है, जिससे भारत की रणनीतिक स्थिति मजबूत होगी।
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व्यापारिक समीकरण और भविष्य की राह
आंकड़ों के अनुसार, 2024 में ईरान के कुल 68 अरब डॉलर के आयात में भारत की हिस्सेदारी मात्र 2.3 प्रतिशत (1.2 अरब डॉलर) रही, जबकि चीन और यूएई का वर्चस्व बना हुआ है। भारतीय निर्यातक वर्तमान में ‘वेट एंड वॉच’ की स्थिति में हैं।
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खामनेई का जाना भारत के लिए पूरी तरह से हार या जीत का सौदा नहीं होगा। यदि ईरान में एक स्थिर और पश्चिम-अनुकूल सरकार आती है, तो चाबहार पोर्ट और निवेश के मोर्चे पर भारत को बड़े फायदे मिल सकते हैं। लेकिन, यदि तख्तापलट के बाद वहां गृहयुद्ध या अस्थिरता की स्थिति पैदा होती है तो यह भारत के क्षेत्रीय हितों के लिए एक बड़ा जोखिम बन सकता है।
