

West Bengal Assembly Elections 2026: पश्चिम बंगाल में लंबे समय से बीजेपी को सियासी जमीन की तलाश थी, क्योंकि पहले लेफ्ट और बाद में तृणमूल कांग्रेस का राज्य में दबदबा था।हालांकि, 2026 विधानसभा चुनाव के नतीजों ने यह साफ कर दिया है कि 'भगवा पार्टी' की तलाश अब पूरी तरह खत्म हो चुका है। माना जा रहा है कि लेफ्ट के पारंपरिक वोटरों के एक हिस्से ने इस बार 'कमल' का साथ दिया है। आइए जानने की कोशिश करते हैं कि क्या वोटों के इस ट्रांसफर ने बंगाल के सत्ता परिवर्तन में मदद की है?
लेफ्ट के कितने वोटर इस चुनाव में बीजेपी के साथ गए यह बताना मुमकिन नहीं है, लेकिन विधानसभा के स्तर के सबूत बताते हैं कि कई सीटों पर काफी वोट ट्रांसफर हुआ है। इसका एक स्पष्ट उदाहरण है भवानीपुर विधानसभा सीट, जहां से ममता बनर्जी और सुवेंदु अधिकारी चुनावी मैदान में आमने-सामने थे।
4 मई को अपनी जीत के भाषण में सुवेंदु अधिकारी ने कहा कि CPI(M) के पास वहां 13,000 वोट थे और दावा किया कि उनमें से कम से कम 10,000 वोट उनकी तरफ शिफ्ट हुए। हालांकि, यह उनका बयान है। लेकिन यह एक करीबी मुकाबले वाली सीट पर बड़े स्तर पर बदलाव को दिखाता है। इसी तरह के पैटर्न दम दम उत्तर जैसी जगहों पर भी देखे गए, जहां CPI(M) का पारंपरिक रूप से मजबूत वोट शेयर रहा है। 2026 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने वह सीट जीती, भले ही लेफ्ट ने अपनी नई पीढ़ी की नेतृत्व का हिस्सा दीपशिता धर को मैदान में उतारा था। ये उदाहरण दिखाते हैं कि कुछ चुनाव क्षेत्रों में, पुराने लेफ्ट वोटरों के एक बड़े हिस्से ने बीजेपी का साथ दिया, जिससे आखिरी नतीजे पर असर पड़ा।
पिछले दस सालों में पश्चिम बंगाल की राजनीति बदल गई है। सालों तक सपोर्ट कम होने के बाद, CPI(M) और दूसरी लेफ्ट पार्टियों को ग्राउंड लेवल पर अपना संगठन फिर से खड़ा करने में चुनौतियों का सामना करना पड़ा। कई सीटों पर, जो वोटर्स कभी लेफ्ट को सपोर्ट करते थे, उन्हें बीजेपी और टीएमसी के बीच सीधा मुकाबला करना पड़ा। ऐसे हालात में कुछ लोगों ने सत्ताधारी पार्टी के लिए बीजेपी को ज्यादा मजबूत चैलेंजर के तौर पर चुना।
चुनावी प्रचार के दौरान लोकल गवर्नेंस, लॉ एंड ऑर्डर पर बहस और विकास से जुड़ी चिंताओं जैसे मुद्दों पर खूब चर्चा हुई। जब वोटर्स बदलाव चाहते हैं, तो वे अक्सर उस पार्टी की तरफ चले जाते हैं जिसे वे जीतने में काबिल समझते हैं। बीजेपी की बढ़ती मौजूदगी, बड़ी रैलियों और फोकस्ड कैंपेन स्ट्रेटेजी ने उसे उन इलाकों में पहचान दिलाई जहां वह पहले कमजोर थी। इस मामले में, कुछ पारंपरिक लेफ्ट वोटर्स ने बीजेपी को सपोर्ट करने का फैसला किया, जिससे करीबी मुकाबले वाली सीटों पर हार-जीत तय हुआ। अब ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह बदलाव लेफ्ट की किसी लंबे समय की स्ट्रैटेजी से जुड़ा हो सकता है? इसका जवाब है नहीं।
ममता बनर्जी की नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस साल 2011 से पश्चिम बंगाल की सत्ता में काबिज थी, जिससे उसे 15 साल का प्रशासनिक अनुभव, एक मजबूत स्टेट नेटवर्क और वेलफेयर पर आधारित पॉलिटिकल बेस मिला है।
बंगाल के भीतर पिछले 10 सालों में बीजेपी काफी तेजी से मजबूत हुई है। जहां एक सीमित मौजूदगी से बढ़कर अलग-अलग इलाकों में सीटें जीतने लगी है। इसने संगठनात्मक काम, बड़ी रैलियों और केंद्रीय नेतृत्व के दौरों में बहुत ज्यादा निवेश किया है, जिससे राज्य के हर हिस्से में पार्टी की मजबूत पकड़ बन चुकी है।
2011 में सत्ता खोने के बाद लेफ्ट लगातार कमजोर होती गई। चुनाव दर चुनाव वोट शेयरों में गिरावट देखने को मिला। इसके अलावा कई विधानसभा क्षेत्रों में लेफ्ट पार्टी की मौजूदगी न के बराबर हो गई है। TMC के खिलाफ, इसका सामना एक मजबूत रूलिंग पार्टी से है। बीजेपी के खिलाफ इसका मुकाबला तेजी से बढ़ रही एक नेशनल पार्टी से है। इसलिए, मुश्किलें सिर्फ पार्टी के नाम के बजाय सीट, वोटर के मूड और स्थानीय नेतृत्व की ताकत के हिसाब से अलग-अलग होती हैं।
साल 2011 में पश्चिम बंगाल ने 1977 में शुरू हुए लेफ्ट फ्रंट के 34 साल के राज के बाद बदलाव के लिए वोट किया। ममता बनर्जी की लीडरशिप में तृणमूल कांग्रेस ने कांग्रेस के साथ एक बड़ा एंटी-इनकंबेंसी अलायंस बनाया। इस पार्टनरशिप ने जिलों में विपक्ष के वोटों को एक साथ लाने में मदद की। कैंपेन में जमीन अधिग्रहण के मुद्दों, खासकर सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलनों पर जोर दिया गया, जो राज्य में सेंट्रल पॉलिटिकल थीम बन गए। इन घटनाओं ने चुनाव से पहले के सालों में पब्लिक डिबेट को आकार दिया। TMC ने ग्रासरूट लेवल पर अपने संगठन नेटवर्क को भी बढ़ाया, टारगेटेड कैंपेनिंग के साथ गांवों और शहरी वार्डों तक पहुंचा। कई इलाकों में वोटरों ने दशकों तक एक ही सरकार के बाद नई लीडरशिप की इच्छा जताई। जब नतीजे घोषित हुए, तो लेफ्ट फ्रंट ने अपना मेजोरिटी खो दिया और TMC ने सरकार बनाई। 2011 का चुनाव पश्चिम बंगाल के इतिहास में सबसे बड़े पॉलिटिकल बदलावों में से एक था, जो बैलेट बॉक्स के जरिए हासिल हुआ।
बंगाल में लेफ्ट शासन के खत्म होने और मौजूदा राजनीतिक बदलाव के बीच क्या समानाताएं देखी जा सकती हैं? दोनों ही पल पश्चिम बंगाल में वोटर के व्यवहार में बड़े बदलाव दिखाते हैं। 2011 में, वोटर दशकों तक सत्ता में रहने के बाद एक लंबे समय से चली आ रही सरकार से दूर चले गए। मौजूदा दौर में वोटरों ने कई विधानसभा सीटों पर फिर से अपनी पुरानी राजनीतिक वफादारी पर फिर से सोचने की इच्छा दिखाई है। दोनों ही मामलों में, एंटी-इनकंबेंसी ने कैंपेन के मूड को बनाने में भूमिका निभाई। जब कोई पार्टी कई सालों तक सत्ता में रहती है, तो लोगों की उम्मीदें बढ़ जाती हैं और लोग सवाल पूछने लगते हैं।
2011 में जमीन और विकास की चिंताओं ने बहसों को प्रभावित किया। हालांकि, 2026 में शासन, रोजगार और सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़े सवाल चर्चाओं में प्रमुखता से शामिल रहे हैं। दोनों बार के बदलाव यह दिखाते हैं कि पश्चिम बंगाल की राजनीति अचानक उथल-पुथल के बजाय बैलेट बॉक्स के जरिए कैसे बदल सकती है। ये पैटर्न इस बात पर जोर देते हैं कि राज्य में वोटर की भावना बदलती रहती है। पॉलिटिकल दबदबा हमेशा रहने वाला नहीं होता और समय के साथ जनता की प्राथमिकताएं बदलने पर चुनावी नतीजे बदल सकते हैं।