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प्रयागराज शंकराचार्य विवाद: पूर्व CBI डायरेक्टर की रिपोर्ट ने योगी सरकार पर उठाए बड़े सवाल, जानें क्या कहा
Magh Mela Controversy: प्रयागराज माघ मेले में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद को गंगा स्नान से रोके जाने पर पूर्व CBI निदेशक नागेश्वर राव की रिपोर्ट जारी हुई, जिसमें योगी सरकार से माफी की मांग की गई है।
- Written By: अर्पित शुक्ला

पूर्व CBI डायरेक्टर की रिपोर्ट (Image- Social Media)
Prayagraj Magh Mela Controversy: प्रयागराज माघ मेला में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को गंगा स्नान करने से रोके जाने के बाद शुरू हुए विवादों के संबंध में तैयार रिपोर्ट को लेकर वाराणसी में खास चर्चा हुई। सीबीआई के पूर्व निदेशक नागेश्वर राव ने मंगलवार को वाराणसी में आयोजित कार्यक्रम के दौरान इस मामले में खास जानकारी दी। साथ ही कार्यक्रम में मौजूद रितु राठौर ने भी मांग की कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ खुद पहल करते हुए ज्योतिर्मठ शंकराचार्य जी से सीधा संवाद स्थापित करें और संबंधित अधिकारियों से बिना शर्त सार्वजनिक क्षमा-याचना सुनिश्चित करें। साथ ही लगातार मिल रही धमकियों को देखते हुए शंकराचार्य की सुरक्षा बढ़ाई जाए।
यह रिपोर्ट 12 मई 2026 को काशी में पूर्व निदेशक, सीबीआई श्री एम. नागेश्वर राव द्वारा सार्वजनिक रूप से प्रकाशित की गई। रिपोर्ट के अनुसार, शंकराचार्य जी पारंपरिक पालकी शोभायात्रा के माध्यम से गंगा स्नान के लिए जा रहे थे। यह शोभायात्रा पूर्व सूचना के साथ प्रशासन की जानकारी में और पुलिस सुरक्षा के बीच शांतिपूर्वक आगे बढ़ रही थी। इसके बावजूद संगम के निकट अंतिम चरण में वरिष्ठ प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों द्वारा इसे रोक दिया गया और शंकराचार्य जी को पालकी से उतरने के लिए कहा गया, जिससे एक स्थापित और परंपरागत धार्मिक प्रक्रिया बाधित हुई।
भगदड़ की आशंका पर समिति ने क्या कहा?
समिति की रिपोर्ट में कहा गया कि अधिकारियों ने इस कार्रवाई को संभावित भगदड़ की आशंका बताकर उचित ठहराने का प्रयास किया। किन्तु वीडियो साक्ष्य और प्रत्यक्षदर्शियों के आधार पर समिति को ऐसी किसी स्थिति का तत्काल कोई संकेत नहीं मिला। समिति का निष्कर्ष है कि यह कारण घटना के बाद औचित्य सिद्ध करने हेतु प्रस्तुत किया गया।
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रिपोर्ट में कहा गया कि बिना किसी अवैध जमाव या तात्कालिक खतरे के, शोभायात्रा के साथ चल रहे श्रद्धालुओं पर बल प्रयोग किया गया। साथ ही, वेद विद्यार्थियों (बटुकों) के साथ दुर्व्यवहार किया गया और उन्हें शिखा पकड़कर घसीटा गया। समिति के अनुसार, यह कार्रवाई केवल भीड़ नियंत्रण तक सीमित नहीं थी, बल्कि धार्मिक आचरण में जानबूझकर हस्तक्षेप थी, जिससे ज्योतिर्मठ शंकराचार्य की संस्थागत गरिमा को ठेस पहुंची।
शंकराचार्य के खिलाफ पॉक्सो केस का मामला
रिपोर्ट में शंकराचार्य के खिलाफ पॉक्सो केस का भी जिक्र किया गया है। इसमें कहा गया कि शंकराचार्य से उनकी वैधता सिद्ध करने के लिए नोटिस जारी किए गए। पॉक्सो अधिनियम सहित आपराधिक कार्यवाहियां प्रारंभ की गईं, जिनमें गंभीर असंगतियां दिखाई देती हैं। इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अग्रिम जमानत का राज्य द्वारा कड़ा विरोध भी राजनीतिक स्तर की सक्रिय भूमिका को दर्शाता है। प्रतिवेदन में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा दिए गए सार्वजनिक वक्तव्यों का भी उल्लेख किया गया है।
इन सभी घटनाओं को समग्र रूप से देखने पर समिति ने निष्कर्ष निकाला है कि यह मामला राज्य शक्ति के उच्चतम स्तरों से संचालित एक समन्वित और गंभीर दुरुपयोग को दर्शाता है, जो ज्योतिर्मठ शंकराचार्य जी और उनकी संस्था के विरुद्ध था।
CM योगी से की गई मांग
इस घटनाक्रम की शुरुआत राज्य की कार्रवाई से हुई, समिति की रिपोर्ट में मांग की गई है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ स्वयं पहल करते हुए ज्योतिर्मठ शंकराचार्य जी से सीधा संवाद स्थापित करें, संबंधित अधिकारियों से बिना शर्त सार्वजनिक क्षमा-याचना सुनिश्चित करें तथा लगातार मिल रही धमकियों को देखते हुए उनकी सुरक्षा बढ़ाई जाए।
संरचनात्मक स्तर पर समिति ने राज्य और धर्म के संबंध में स्पष्ट सुधार की आवश्यकता बताई है। इसके तहत यह अनुशंसा की गई है कि धार्मिक मामलों का संचालन धार्मिक संस्थाओं के अधीन हो, जबकि राज्य अपने लौकिक दायित्वों तक सीमित रहे।
उत्तर प्रदेश हिंदू धर्म परिषद का गठन
इसी मामले में समिति ने “उत्तर प्रदेश हिंदू धर्म परिषद” नामक एक वैधानिक स्वायत्त निकाय के गठन का प्रस्ताव भी रखा है, जिसकी अध्यक्षता ज्योतिर्मठ शंकराचार्य जी करें और जिसमें मंदिरों, अखाड़ों और मठों सहित पारंपरिक हिंदू धार्मिक संस्थाओं के प्रतिनिधि शामिल हों।
समिति ने स्पष्ट किया है कि शंकराचार्य जी को अध्यक्ष बनाने की अनुशंसा किसी पक्षपात पर नहीं, बल्कि संस्थागत आधार पर है। ज्योतिर्मठ (उत्तराम्नाय मठ), जिसकी स्थापना भगवान आदि शंकराचार्य ने लगभग 2500 वर्ष पूर्व की थी, उत्तर भारत सहित उत्तर प्रदेश में एक निरंतर और व्यापक रूप से मान्यता प्राप्त ऐसी आध्यात्मिक परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है, जो विभिन्न संप्रदायों के बीच समन्वय और संतुलन स्थापित करने में सक्षम है।
धार्मिक मामलों में राज्य का हस्तक्षेप रुके
समिति ने कहा कि इस प्रकार की संरचनात्मक स्पष्टता आवश्यक है, ताकि राज्य और धार्मिक स्वायत्तता के बीच संतुलन पुनः स्थापित हो, हिंदू धार्मिक मामलों में राज्य के हस्तक्षेप को रोका जा सके और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
यह भी पढ़ें- ‘BJP चाहे तो डिप्टी सीएम बना दें’, पूजा पाल को लेकर अखिलेश यादव का योगी सरकार पर सियासी हमला
अंत में समिति ने कहा कि काशी जो सनातन धर्म का प्रमुख आध्यात्मिक और सभ्यतागत केंद्र है यहां से इस प्रतिवेदन को जारी करना इस विषय के व्यापक महत्व को रेखांकित करता है, जो केवल प्रयागराज की एक घटना तक सीमित नहीं, बल्कि राज्य और हिंदू धार्मिक स्वायत्तता के व्यापक संबंध से जुड़ा हुआ है।
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