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एक्सक्लूसिव: शंकराचार्य की गरिमा पर एक अभूतपूर्व चोट, स्वामी अभिमुक्तेश्वरानंद ने याद दिलाई पेशवाओं की परंपरा
Avimukteshwaranand Exclusive: प्रयागराज माघ मेले में शंकराचार्य स्वामी अभिमुक्तेश्वरानंद की पालकी रोके जाने और शिष्यों के साथ हुए अभद्र व्यवहार ने राजनीतिक और धार्मिक मोड़ ले लिया है।
- Written By: अमन उपाध्याय

स्वामी अभिमुक्तेश्वरानंद, फोटो (सो. सोशल मीडिया)
Shankaracharya Avimukteshwaranand Interview: प्रयागराज की पावन धरती पर लगने वाला माघ मेला इस वर्ष भक्ति और आस्था के बजाय विवादों और राजनीति की भेंट चढ़ता नजर आया। संगम तट पर सनातन धर्म की सर्वोच्च पीठ ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अभिमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी की पालकी को रोके जाने और उनके शिष्यों के साथ प्रशासन द्वारा किए गए कथित अनुचित व्यवहार ने पूरे देश में चर्चा का माहौल गरमा दिया है। इस विषय पर महाराज जी ने विस्तार से अपनी बात रखी और उन ऐतिहासिक संदर्भों को याद किया जो वर्तमान व्यवस्था के आइने में धुंधले पड़ते जा रहे हैं।
संगम की महिमा: वेदों और मानस के झरोखे से
शंकराचार्य जी ने बातचीत की शुरुआत वेदों और रामचरितमानस की चौपाइयों से की। उन्होंने बताया कि जहां श्वेत (गंगा) और श्यामल (यमुना) धाराओं का मिलन होता है, वह स्थान हिंदुओं के लिए विश्व का सबसे पवित्र तीर्थ है। यहाँ देवता भी ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर स्वयं को धन्य करते हैं। तुलसीदास जी ने भी भरत जी के माध्यम से इस संगम की महिमा का गुणगान किया है। महाराज जी ने स्पष्ट किया कि माघ स्नान कोई नया आयोजन नहीं, बल्कि अनादि काल से चली आ रही वह परंपरा है जो सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करते ही शुरू हो जाती है।
इतिहास के पन्ने: मुगलों का जजिया और पेशवाओं की ललकार
इतिहास का संदर्भ देते हुए महाराज जी ने बताया कि एक समय था जब मुगलों ने काशी और प्रयाग पर नियंत्रण कर हिंदुओं पर जजिया कर लगा दिया था। उस दौर में हिंदुओं को अपने ही तीर्थों में स्नान से वंचित किया गया। तब पेशवाओं ने ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य जी से हस्तक्षेप का आग्रह किया। पेशवाओं ने अपने कंधों पर शंकराचार्य जी की पालकी उठाकर संगम तक पहुंचाई, जिसे ‘पेशवाई’ कहा गया। महाराज जी ने जोर देकर कहा कि तीर्थों में स्नान हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है न कि किसी सत्ता या राज्य द्वारा दिया गया दान।
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प्रोटोकॉल का दोहरा मापदंड
शंकराचार्य जी ने आधुनिक गणतंत्र का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार 26 जनवरी या 15 अगस्त पर राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के लिए एक विशेष प्रोटोकॉल और रास्ते सुनिश्चित किए जाते हैं, ठीक उसी प्रकार माघ मेले जैसे धार्मिक आयोजनों में धर्माचार्यों की अपनी मर्यादा और गरिमा होती है। यह मेला सनातनी समाज का है और यहाँ के नियम धर्मशास्त्रों और परंपराओं के अनुसार होने चाहिए, न कि केवल प्रशासनिक आदेशों के अधीन।
प्रशासनिक प्रहार के साथ-साथ प्रतीकों का अपमान
प्रयागराज प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाते हुए महाराज जी ने कहा कि इस बार न केवल परंपरा तोड़ी गई, बल्कि सनातन धर्म के जीवंत और निर्जीव प्रतीकों पर प्रहार किया गया। शंकराचार्य के प्रतीक माने जाने वाले छत्र, सिंहासन और दंड के साथ-साथ ब्रह्मचारियों और सन्यासियों पर लाठियां बरसाई गईं। उन्होंने बड़े दुखी मन से बताया कि हिंदू धर्म के सर्वोच्च सम्मान ‘शिखा’ (चोटी) को उखाड़ने और अपमानित करने का दृश्य पहली बार देखा गया।
सत्ता और न्यायतंत्र की भूमिका पर भी सवाल
महाराज जी ने उत्तर प्रदेश की वर्तमान सरकार और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश के मुखिया द्वारा सदन में दिए गए वक्तव्य इस बात की पुष्टि करते हैं कि यह सब एक सोची-समझी नीति के तहत हुआ। वर्तमान में धर्माचार्यों पर जिस प्रकार के आपराधिक मुकदमे लादे जा रहे हैं, वह सनातनी समाज के लिए चिंता का विषय है। उन्होंने इसे स्वतंत्र भारत में शंकराचार्य की गरिमा पर एक अभूतपूर्व चोट करार दिया।
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परंपरा बनाम आधुनिक सत्ता
शंकराचार्य स्वामी अभिमुक्तेश्वरानंद जी ने यह संदेश दिया कि धर्म किसी सत्ता की दया का मोहताज नहीं है। प्रयागराज का माघ मेला लाखों वर्षों की आस्था का प्रतीक है और प्रशासन का काम व्यवस्था बनाना है, न कि पुरातन परंपराओं का दमन करना। उन्होंने स्पष्ट किया कि सनातनी समाज इस अपमान को भूला नहीं है और धर्म की रक्षा के लिए वे सदैव अडिग रहेंगे।
और ज्यादा जानने के लिए देखें ये खास इंटरव्यू…..
Shankaracharya avimukteshwaranand interview magh mela prayagraj controversy
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