
मौत बेचने की हड़बड़ी में बेनकाब सोशल मीडिया (सौ.डिजाइन फोटो)
नवभारत डिजिटल डेस्क: गत 11 नवंबर को परिवार के बार-बार खंडन करने के बावजूद मौत बेचने को बेकरार टीवी और सोशल मीडिया झूठी खबरें चलाईं, वह इस तीव्र और आधुनिक मीडिया की फूहड़ता और अनैतिक अधीरता का सबसे बड़ा नमूना था। ‘धर्मेंद्र चले गए’, ‘नहीं रहे बॉलीवुड के पहले ही-मैन’ जैसी ब्रेकिंग न्यूज जिस तरह लगातार करीब 1,000 वेबसाइटों और दर्जनों टीवी चैनलों में बार-बार आती रही वह न सिर्फ अपमानजनक, हास्यास्पद बल्कि बेहद डरावनी थी। एक जमाने में कहा जाता था कि मीडिया समाज का आईना है। मगर तीव्रता के नाम पर टीवी और डिजिटल मीडिया झूठ को चमकाकर आईना बना देने पर तुले हैं। सोशल मीडिया जो शुरुआत में जनता की आवाज कहलाता था, आज लाइक्स और सब्सक्रिप्शन पाने की होड़ में किसी भी हद तक गिर सकता है, यहां संवेदना नहीं, सनसनी बिकती है।
धर्मेंद्र की मौत की 11 नवंबर को जिस तरह पूरे दिन झूठी खबरें चलाई गई, वह क्लिक और व्यूज के खतरनाक और बेहिचक आपराधिक नजरिए का नमूना है। डिजिटल मीडिया में खबर से ज्यादा जरूरी है, सबसे पहले होना। धर्मेंद्र के निधन की अफवाह इसी होड़ की हड़बड़ी का नतीजा थी। सोशल मीडिया पर चंद मिनटों में लाखों लाख जिस तरह से धर्मेंद्र की मौत के पेज निर्मित हो गए और उन्हें अभिनेता के लिए झूठी संवेदनाओं से रंग दिए गए, वह बेहद खतरनाक है। कुछ मीडिया चैनल और न्यूज पोर्टल धर्मेंद्र की पत्नी हेमा मालिनी और बेटी ईशा देओल के इस स्पष्टीकरण के बावजूद कि धर्मेंद्र की हालत स्थिर है और वह इलाज को उचित रिस्पांस दे रहे हैं, इसके बावजूद डिजिटल मीडिया में शाम तक धर्मेंद्र के न रहने की खबरें आती रहीं। कुछ ने तो बड़े-बड़े श्रद्धांजलि वीडियो भी दिखा दिए।
जब खुद धर्मेंद्र ने ने कैमरा के सामने सामने आकर मुस्कुराते हुए कहा, भाई अभी तो जिंदा हूं, तब कहीं जाकर यह तेज और दिखाऊ मीडिया शांत हुआ। वास्तव में सोशल मीडिया इस व्यवसाय का सबसे सस्ता संस्करण बन चुका है, जो मौत को महज एक बेहतर और सनसनीखेज कंटेंट मानती है। इसके पहले भी सोशल मीडिया और टीवी मीडिया दिलीप कुमार और लता मंगेशकर की मौतों का तमाशा बना चुकी हैं। अमिताभ बच्चन और रजनीकांत जैसे लोकप्रिय कलाकारों की मौत की ब्रेकिंग खबरें बनाकर बेशर्मी से दोनों हाथ कमाई कर चुकी हैं। दिन पर दिन जिस तरह से सोशल मीडिया हर भावनात्मक मुद्दे को भुनाने के फिराक में अफरा-तफरी मचाने से बाज नहीं आता, इससे पता चलता है कि आने वाले दिनों में किस तरह आधुनिक मीडिया भावनाओं की लाशों पर एंगेजमेंट का कारोबार बनकर रह जाएगा।
धर्मेंद्र बॉलीवुड के बहुत से अभिनेताओं में से एक नहीं हैं, वह बॉलीवुड के सबसे मानवीय चेहरों में से एक हैं। गांव की मिट्टी और मासूम सपनों को लेकर मुंबई पहुंचे धर्मेंद्र ने अपनी इन्हीं खूबियों के चलते हिंदी सिनेमा को अपना दीवाना बना लिया। 1960 के रोमांटिक दौर में ‘फूल और पत्थर’ जैसी फिल्मों में जिस नायकत्व की परिभाषा गढ़ी, वह न तो शुद्ध ‘माचो’ थी और न ही केवल रोमांस का एक पक्ष थी। ऐसे हीरो का देश के घर-घर का चहेता होना ही था। इसलिए धर्मेंद्र की इज्जत न सिर्फ 60-70 और 80 के दशक की फिल्म देखने वाली पीढ़यों में है बल्कि उन पीढ़यों में भी धर्मेंद्र की विराट अभिनय क्षमता के लिए सम्मान है, जिसने उन्हें पर्दे में गहन इंतजार के बाद नहीं देखा बल्कि मनोरंजन के क्रम में देखा है। यह पीढ़ी भी धर्मेंद्र की बहुस्तरीय प्रतिभा का एहसास करती है और रोमांचित रहती है।
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आज का टीवी और डिजिटल मीडिया जल्दी से जल्दी अपने सुपरहीरो की लोकप्रियता का फायदा, अपने व्यासायिक हितों के तौर पर करना चाहता है। आज का डिजिटल और टीवी मीडिया सबसे आगे निकलने की होड़ में और किसी चीज की परवाह नहीं करता, फिर चाहे वह किसी की प्रतिष्ठा ही क्यों न हो। इसलिए बीते दिन विभिन्न टीवी चैनलों और लाइव टेलीकास्ट करने वाली मीडिया एजेंसियों ने जिस तरह से बार-बार धर्मेंद्र की मौत की ब्रेकिंग न्यूज दी, वह सिचुएशन को अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश का हिस्सा है।
लेख- वीना गौतम के द्वारा






