नवभारत संपादकीय: त्रिभाषा फार्मूले पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, रोक लगाने से किया इनकार

SC on Three Language Formula: स्कूलों में त्रिभाषा फार्मूला लागू करने पर रोक लगाने से सुप्रीम कोर्ट ने इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि शिक्षा नीति निर्धारण कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र के विषय हैं।
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सुप्रीम कोर्ट (डिजाइन फोटो,सोर्स- नवभारत)
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Supreme Court Refuses Stay On Three Language Formula: स्कूलों में त्रिभाषा फार्मूला लागू करने पर रोक लगाने से सुप्रीम कोर्ट ने इनकार कर दिया। ऐसा करना न तो हिंदी का समर्थन है न देश की भाषाई विविधता को नकारना है। वास्तव में सुप्रीम कोर्ट ने संवैधानिक सिद्धांत की ही पुष्टि की है कि अदालतें सार्वजनिक नीति में हस्तक्षेप नहीं करतीं और न्यायपालिका राजनीतिक असहमति को हल करने या सुलझाने का मंच नहीं है। यदि कोई सरकारी नीति विवादास्पद है या उसे लेकर प्रशासकीय विवाद है तो अदालत उसमें दखल नहीं देती।

दक्षिण भारत के राज्यों में विरोध

कई राज्यों खास तौर पर दक्षिण भारत के राज्यों ने त्रिभाषा नीति का यह कहकर विरोध किया है कि शैक्षणिक सुधार के नाम पर उन पर पिछले दरवाजे से हिंदी लादी जा रही है। इन राज्यों को अपनी क्षेत्रीय भाषा और अंग्रेजी चाहिए, लेकिन तीसरी भाषा के रूप में वह हिंदी स्वीकार करना नहीं चाहते। इसे उन्होंने क्षेत्रीय स्वाभिमान और अस्मिता का मुद्दा बनाया है। ये राज्य समझने को तैयार नहीं हैं कि हिंदी का संपर्क भाषा के रूप में महत्व है। हिंदी विरोध की यह राजनीति आत्मघाती है। कितने ही दक्षिण भारतीय IAS व IPS अधिकारियों की जब अन्य राज्यों में पोस्टिंग होती है तो वह उन राज्यों की भाषा व हिंदी को बड़ी जल्दी सीख लेते हैं।

त्रिभाषा फार्मूले पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

तमिलनाडु में हिंदी विरोध की राजनीति काफी पुरानी है। वहां के लोग अपनी भाषा के प्रति संवेदनशील हैं और हिंदी के वर्चस्व के खिलाफ हैं। जब तक कोई स्पष्ट संवैधानिक उल्लंघन नहीं होता, न्यायपालिका ऐसे राजनीतिक मतभेद का निपटारा नहीं करेगी। त्रिभाषा फार्मूले पर स्थगनादेश की मांग करते हुए याचिकाकर्ता यह नहीं बता पाए कि इस नीति को लागू करने से ऐसा कौन-सा नुकसान होगा, जिसे रोकने के लिए तत्काल न्यायिक हस्तक्षेप चाहिए, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पाठ्यक्रम निर्धारण तथा शिक्षा नीति जैसे मुद्दे कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।

वैचारिक विवादों में अदालत क्यों दखल दे? यदि कुछ राज्यों के विरोध की वजह से हर नीति में न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की गई तो सुशासन अदालती चंगुल में फंस जाएगा। इतने पर भी केंद्र सरकार को चाहिए कि जब वह कोई राष्ट्रव्यापी नीतिगत निर्णय लेती है, तो संबंधित पक्षों से विचार-विमर्श कर आम राय बनाने का प्रयास करे।

बहुभाषी शिक्षा के फायदे बताने का प्रयास

शिक्षा नीति से होने वाले लाभ के बारे में बताकर आशंकाएं दूर की जानी चाहिए। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में बहुभाषी होना लाभदायक है। मातृभाषा व अंग्रेजी के अलावा तीसरी भाषा सीखना उपयोगी रहेगा। यह नीति किसी के अधिकार छीनने वाली नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप करने से मना कर दिया है। अब भाषा नीति पर केंद्र और राज्यों में आपसी चर्चा व समन्वय से मामला सुलझ सकता है। भाषाई विविधता समय की मांग है।

लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

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