निशानेबाज: मोह-माया का बड़ा गहरा असर, राबड़ी नहीं छोड़ना चाहती घर

बिहार की नीतीश कुमार सरकार ने पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ीदेवी को आदेश दिया है कि वह अपना 10, सर्कुलर रोड आवास खाली कर दें लेकिन राजद इस बंगले को खाली नहीं करने पर अड़ा हुआ है।
राबड़ी नहीं छोड़ना चाहती घर
राबड़ी नहीं छोड़ना चाहती घर (सौ. डिजाइन फोटो)
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नवभारत डिजिटल डेस्क: पड़ोसी ने हमसे कहा, ‘निशानेबाज, बिहार की नीतीश कुमार सरकार ने पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ीदेवी को आदेश दिया है कि वह अपना 10, सर्कुलर रोड आवास खाली कर दें लेकिन राजद इस बंगले को खाली नहीं करने पर अड़ा हुआ है। इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक घमासान तेज होता जा रहा है। ’ हमने कहा, ‘उस मकान में 2 पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव व राबड़ी देवी रहते हैं। अब इस ढलती उम्र में उनसे घर खाली करने के लिए कहा जा रहा है। सीनियर सिटिजन्स के लिए कुछ तो दया होनी चाहिए।जिस घर में लंबे समय तक रहो, उससे गहरा लगाव हो जाता है और छोड़ने का मन नहीं करता। वहां लालू-राबड़ी ने अपनी प्रिय गाय-भैसों का तबेला भी बना रखा होगा ,उनकी 7 बेटियों का मायका भी वहीं है। ’

पड़ोसी ने कहा, ‘निशानेबाज, भाजपा व जदयू नेताओं ने कहा है कि सरकारी भवन में निवास स्थायी नहीं होता। लालू मोह-माया के चक्कर में पड़ गए हैं। नियमानुसार उन्हें घर खाली करना चाहिए। जब सरकार राबड़ी देवी को विधान परिषद में विपक्ष के नेता के तौर पर 39, हार्डिंग रोड का दूसरा आवास दे रही है तो वहां शिफ्ट हो जाने में क्या हर्ज है?’ हमने कहा, ‘आप लालू और राबड़ी की भावना या इमोशन समझ नहीं रहे हैं। मकान सिर्फ 4 दीवारों से नहीं बनता, उससे मन जुड़ जाता है। दिल में आवाज उठती है- जीना यहां, मरना यहां, इसके सिवा जाना कहां! उम्र के चौथे पड़ाव में वह अपनी जगह से हिलना नहीं चाहते। ’

पड़ोसी ने कहा, ‘निशानेबाज, राबड़ी देवी और लालू के पास चारा घोटाले और लैंड फार जॉब घोटाले की इतनी दौलत है कि वह अपने लिए महल बनवा सकते हैं। सरकारी आवास को कब तक हथियाए रहेंगे? यह तो वैसी ही प्रवृत्ति है- राम-राम जपना, पराया माल अपना! दिल्ली में भी कितने ही पूर्व सांसद हैं जो चुनाव हारने पर भी सरकारी बंगला नहीं छोड़ते। उन्हें लगता है कि अगली बार चुनाव जीत गए तो इतना अच्छा मकान फिर कहां मिलेगा। ऐसे नेताओं को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस पुराने बयान से कुछ सीखना चाहिए जिसमें उन्होंने कहा था- हम तो फकीर आदमी ठहरे, कभी भी झोला-डंडा उठाकर चल देंगे। ’

लेख-चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

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