असम की राजनीति में पाकिस्तान और मियां-मुस्लिम का लग रहा 'तड़का', जनता के असल मुद्दे कहां?

Assam Politics : असम की राजनीति में हाल में पाकिस्तान और मियां-मुस्लिम जैसे मुद्दों पर काफी ज्यादा जोर दिया जा रहा है। इस राजनीतिक बहस में खुद मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा भी शामिल हैं।
Pakistan and Mian-Muslim are adding spice to Assam politics, where are the real issues of the people?
असम के राजनीतिक हालात को बयां करती प्रतीकात्मक तस्वीर। इमेज-एआई
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Assam News : असम की सियासत इन दिनों अजीब से विरोधाभास से गुजर रही। एक तरफ राज्य विधानसभा चुनाव की दहलीज पर खड़ा है, जहां जनता को भविष्य और बुनियादी सुविधाओं की उम्मीद है। दूसरी ओर चुनावी विमर्श का केंद्र पाकिस्तान, मियां-मुस्लिम और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे ध्रुवीकरण वाले मुद्दे बन गए हैं।

मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने हाल में अपनी राजनीति को पूरी तरह से मियां-मुस्लिम और बाहरी घुसपैठियों के इर्द-गिर्द केंद्रित कर लिया है। उन्होंने कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई की पत्नी के पाकिस्तान से कथित लिंक को लेकर जांच बैठाकर हमले को व्यक्तिगत और तीखा बना दिया है। बीजेपी इसे राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ रही है। सीएम के बयानों में मियां समुदाय को राज्य से बाहर करने की बात बार-बार दोहराई जा रही है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इसे हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण की सोची-समझी साजिश बता रहे हैं।

बाढ़ और पर्यावरण: हाशिये पर असली संकट

विडंबना है कि 3.5 करोड़ की आबादी वाले इस राज्य में बाढ़ हर साल का एक ऐसा कड़वा सच है, जो लाखों जिंदगियां तबाह कर देता है। ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों का कहर फसलों और घरों को लील जाता है, लेकिन इस चुनावी शोर में बाढ़ मुक्त असम का मुद्दा कहीं खो गया है। जलवायु परिवर्तन और वनों की अवैध कटाई ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है। मगर, सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच इस पर कोई ठोस विजन नजर नहीं आ रहा है।

बेरोजगारी और जमीन का सवाल

असम की अर्थव्यवस्था चाय, तेल और अब सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों पर टिकी है, लेकिन ग्रामीण इलाकों में बेरोजगारी और महंगाई युवाओं के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द है। साथ ही जनजातीय अधिकारों और भूमि के मुद्दों पर भी गहरी चुप्पी है। बोडो, कार्बी और मिसिंग जैसी जनजातियों के हितों की बात करने के बजाय सरकारी जमीन कॉर्पोरेट घरानों को आवंटित करने के फैसलों पर विवाद बढ़ रहा है। दीमा हसाओ जिले में जमीन आवंटन का मामला हाईकोर्ट तक पहुंचा, लेकिन चुनावी मंचों पर इसकी गूंज सुनाई नहीं दे रही है।

क्या जनता के मुद्दे वापसी करेंगे?

सवाल यह है कि क्या आने वाले चुनावों में स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी ढांचा जैसे मुद्दे मियां-मुस्लिम और पाकिस्तान की बयानबाजी से आगे निकल पाएंगे? मतदाता सूची में हेरफेर और जनजातीय जमीन पर अतिक्रमण जैसे संवेदनशील विषय असम की जनता के लिए अधिक महत्वपूर्ण हैं, लेकिन फिलहाल चुनावी हवा का रुख सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की ओर ही मोड़ा जा रहा है। असम की असली तरक्की इस बात पर निर्भर करेगी कि विकास के वास्तविक मुद्दे इस शोर में दब न जाएं।

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