नवभारत विशेष: जुगाड़ बार-बार, नीतीश बने CM 10वीं बार

Nitish Kumar 10th time CM: चुनावी पंडितों की तमाम नकारात्मक भविष्यवाणियों के बावजूद आखिरकार नीतीश कुमार बिहार के 10 वीं बार मुख्यमंत्री बन गए। उन्होंने मुख्यमंत्री बनने का रिकॉर्ड बनाया है।
जुगाड़ बार-बार, नीतीश बने CM 10वीं बार
नीतीश बने CM 10वीं बार (सौ. डिजाइन फोटो)
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नवभारत डिजिटल डेस्क: नीतीश के सबसे ज्यादा बार मुख्यमंत्री रहने का कारण सिर्फ उनकी लोकप्रियता भर नहीं है, इसमें उनके फॉर्मूला मास्टर होने का भी योगदान है। वर्तमान में भारत की चुनावी राजनीति का फॉर्मूला लगता है, अब एक नए संक्रमणकाल से गुजर रहा है। भारतीय लोकतंत्र की चुनावी यात्रा के अब तक के सफर में नए प्रचलन स्थापित हो रहे हैं। पहले पिछड़ी दलित अगड़ी और अल्पसंख्यक मुस्लिम के आधार पर पार्टियां मतदाताओं का समीकरण तैयार करती थीं, अब वह वर्गीकरण दरकना शुरू हो चुका है।

अब मुख्य रूप से तीन राजनीतिक वर्ग रेखांकित हो रहे हैं, ये हैं किसान, युवा और महिला। इसमें सबसे प्रमुख राजनीतिक वर्ग महिला का बना है। किसान और युवा पहले भी राजनीतिक दलों का इमोशनल डोमेन हुआ करता था पर अब महिला मतदाता का जेंडर समूह एक बड़ा पॉलिटिकल डोमेन बनकर उभरा है, क्योंकि संख्या के हिसाब से यह आधी आबादी है। महिलाओं के लिए प्रावधानित मासिक या एकमुश्त भत्ता दिए जाने की जो होड़ लगी है चाहे उन्हें आजीविका के साधन के नाम पर दिया जाए, चाहे युवा महिला वर्ग की पढ़ाई और छात्रवृति के रूप में दिया जाए या फिर लड़की की शादी के लिए दिया जाए।

गौरतलब है कि महिलाओं के लिए धन स्थानांतरण के इस राजनीतिक आइडिया को कई जगह योजना का रूप दिया गया। जैसे मध्य प्रदेश में लाड़ली बहन योजना, कहीं धनलक्ष्मी योजना, तो कहीं महिला आजीविका योजना के रूप में ये दृष्टिगोचर हुआ। इस क्रम में हरियाणा की सैनी सरकार, महाराष्ट्र की शिंदे सरकार और झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार ने पिछले विधानसभा चुनाव के ऐन वक्त पहले महिलाओं के आर्थिक हितों की इन घोषणाओं को योजनाओं में अंजाम दिया। इसका परिणाम ये हुआ कि इन तीनों प्रदेशों में पदारूढ़ सरकारें पुनः विजयी हो गईं। यही प्रयोग बिहार की पदारूढ़ सरकार ने भी प्रदेश की 75 लाख महिलाओं को दस हजार की एकमुश्त आजीविका कमाई की राशि के रूप में स्थानांतरित कर किया है।

हर राज्य में चुनावी रेवड़ी:

कुल मिलाकर मुफ्त और रेवड़ी भारतीय लोकतंत्र की चुनावी राजनीति का सबसे बड़ा फॉर्मूला बनकर उभरा है। बताया जाता है कि बिहार सरकार को महिला आजीविका के एवज में कुल 40000 करोड़ की राशि स्थानांतरित करनी पड़ी है। इससे पूर्व रेवड़ी की राजनीति शुरू करने के एवज में कांग्रेस शासित कर्नाटक, हिमाचल और तेलंगाना की वित्तीय स्थिति प्रभावित हुई। इसी तरह महाराष्ट्र में भी लाड़की बहीण योजना से खजाने पर भारी बोझ पड़ा है। प्रश्न ये है इस बोझ से कैसे निपटा जाएगा? देश के कुछ ही राज्य ऐसे हैं जिनके घरेलू राजस्व कमाई की हिस्सेदारी उनके कुल बजट में दो तिहाई से ज्यादा है जिसमें तमिलनाडु, गुजरात, महाराष्ट्र, ओडिशा और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य शामिल हैं पर बिहार शराबबंदी की वजह से पहले से ही करीब 5 से 10 हजार करोड़ सालाना राजस्व का नुकसान उठा रहा है। उसे मुफ्तखोरी की मार ज्यादा झेलनी पड़ेगी बशर्ते डबल इंजन की सरकार से उसे अतिरिक्त वित्तीय ताकत प्राप्त हो।

चुनाव में लोकलुभावनवाद और रेवड़ी संस्कृति पर भी दो वर्ष पूर्व सुप्रीम कोर्ट, चुनाव आयोग और स्वयं प्रधानमंत्री की तरफ से राजनीतिक दलों के घोषणा पत्रों की एक लक्ष्मण रेखा तय किए जाने की पुरजोर वकालत की गई। पर प्रतियोगी चुनावी व्यवस्था में कोई भी दल इस पर अभी तक उसी तरह से हामी नहीं भर पाए। यदि बिहार की बात करें तो सत्तारूढ़ दल ने अपनी घोषणा पर 40 हजार करोड़ खर्चे। हालांकि बिहार का चुनावी परिणाम केवल रेवड़ी का खेल था, ऐसा नहीं कहा जा सकता बल्कि नीतीश के नेतृत्व वाले एनडीए का भरोसा भी लोगों पर सर चढ़कर बोल रहा था, जिस तथ्य को सभी राजनीतिक पंडितों को स्वीकार करना पड़ा।

महिलाओं का मिला भारी समर्थन

चुनावी पंडितों की तमाम नकारात्मक भविष्यवाणियों के बावजूद आखिरकार नीतीश कुमार बिहार के 10 वीं बार मुख्यमंत्री बन गए। इसी के साथ ही उन्होंने संख्या के हिसाब से देश में किसी भी राज्य के सबसे ज्यादा बार मुख्यमंत्री बनने का रिकॉर्ड भी बना दिया, लेकिन ज्यादा समय तक, दिनों के हिसाब से मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड सिक्किम के मुख्यमंत्री रहे पवन कुमार चामलिंग का है। वह 24 साल 165 दिनों तक सिक्किम के मुख्यमंत्री रहे हैं।

लेख- मनोहर मनोज के द्वारा

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