संपादकीय: कब तक मेलघाट में होती रहेंगी कुपोषण मौतें?

Death Due to Malnutrition: मेलघाट पर यदि मुंबई में बैठी महाराष्ट्र सरकार की नजर जाती तो वहां पिछले 6 माह के दौरान 65 शिशुओं की कुपोषण से मौत नहीं होती।
कब तक मेलघाट में होती रहेंगी कुपोषण मौतें
कब तक मेलघाट में होती रहेंगी कुपोषण मौतें (सौ. डिजाइन फोटो)
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नवभारत डिजिटल डेस्क: मेलघाट पर यदि मुंबई में बैठी महाराष्ट्र सरकार की नजर जाती तो वहां पिछले 6 माह के दौरान 65 शिशुओं की कुपोषण से मौत नहीं होती। इस संबंध में दाखिल जनहित याचिकाओं पर विचार करते हुए बाम्बे हाईकोर्ट ने बेहद लापरवाह रवैये के लिए राज्य सरकार को फटकार लगाई और कहा कि यह भयावह है जिसके लिए सरकार को चिंतित होना चाहिए। राज्य में कुपोषण के मुद्दे से जुड़ी जनहित याचिकाओं पर हाईकोर्ट 2006 से सुनवाई कर रहा है लेकिन आदिवासी बहुल मेलघाट की हालत नहीं सुधरी।

अमरावती जिले का आकार-प्रकार काफी बड़ा है। इसका विभाजन कर अचलपुर को जिले का दर्जा दिया जाए तो मेलघाट पर ध्यान देना प्रशासन के लिए सुविधाजनक रहेगा। विदर्भ में वाशिम, गड़चिरोली और गोंदिया जैसे 3 नए जिले बनाए गए लेकिन न जाने क्यों सरकार ऐतिहासिक शहर अचलपुर को जिला नहीं बना रही है? हाईकोर्ट ने तो 2023 में भी मेलघाट में होनेवाली कुपोषण मौतों पर विस्तृत रिपोर्ट मंगवाई थी। बरसात में मेलघाट से संपर्क टूट जाता है। आदिवासी पुरुष काम ढूंढने अन्यत्र चले जाते हैं और वहां सिर्फ महिलाएं, बच्चे व बूढ़े रह जाते हैं। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र या चिकित्सा सुविधा भी उपेक्षित है। जब खाने का ठिकाना नहीं तो पोषण दूर की बात है।

महाराष्ट्र में 5 वर्ष से कम आयु के 40 प्रतिशत बच्चे कुपोषण की वजह से कमजोर व ठिगने हैं। उनका विकास नहीं हो पा रहा है। राजस्थान में ऐसे बच्चे 36 प्रतिशत और बिहार में 42 प्रतिशत हैं। इस वर्ष की शुरूआत में इंस्टीट्यूट आफ पॉपुलेशन साइंस के सर्वे से यह बात सामने आई कि 5 वर्ष से कम आयु के 35 प्रतिशत बच्चों का वजन बेहद कम है तथा 26 प्रतिशत बच्चे अपनी ऊंचाई को देखते हुए बहुत दुबले-पतले हैं। वैश्विक पोषण रिपोर्ट 2020 में भी कहा गया कि 5 साल से कम उम्र के 35 प्रतिशत बच्चों का वजन बहुत कम है। जुलाई में महाराष्ट्र के महिला व बाल विकास मंत्री ने विधानसभा में लिखित उत्तर में कहा था कि राज्य में 1,80,000 बच्चे कुपोषित हैं। इनमें से 30,800 अत्यंत कुपोषणग्रस्त हैं।

आंकड़े तो बहुत हैं लेकिन समस्या के हल की ओर किसी का ध्यान नहीं है। राजनेता और सरकारों का ध्यान इतने वर्षों तक राजनीति करने और अपनी सत्ता कायम रखने पर रहा है। बुनियादी सुशासन पर यदि ध्यान दिया जाता तो इतनी गंभीर स्थिति उत्पन्न नहीं होती। सिर्फ मेलघाट ही नहीं, मुंबई के पास पालघर जैसे इलाके तथा शहरी क्षेत्रों में भी कुपोषण बढ़ रहा है। स्वच्छ पेयजल के अभाव में पेट की बीमारियां भी बढ़ रही हैं। शहरों की पिछड़ी बस्तियों में यह समस्या व्याप्त है। कैसा विरोधाभास है कि 45 लाख करोड़ के जीडीपी वाले प्रगतिशील महाराष्ट्र में हर तीसरा बच्चा कुपोषण का शिकार है! यदि सरकार इच्छाशक्ति दिखाए तो यह ज्वलंत समस्या हल हो सकती है।

लेख-चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

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