
'इस्लामिक नाटो' (सौ. डिजाइन फोटो)
नवभारत डिजिटल डेस्क: ब्लूमबर्ग की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, इस संबंध में बातचीत काफी आगे बढ़ चुकी है और जल्द ही डील फाइनल हो सकती है। इसमें सऊदी अरब का खजाना, पाकिस्तान का न्यूक्लियर हथियार और तुर्किए की मजबूत मिलिट्री पावर इस इस्लामिक नाटो में एक साथ आ रही हैं। भारत इस डील पर गहरी नजर रख रहा है। क्योंकि भारत और इजराइल के लिए यह सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है? ऐसे में सवाल है कि भारत को किस तरह की रणनीति अपनानी चाहिए? आईएमसीटीसी को 2015 में घोषित किया गया था, इसमें दर्जनों मुस्लिम देश शामिल हैं।
आलोचक इसे कभी-कभी ईरान-विरोधी/शिया-विरोधी झुकाव वाला भी मानते रहे हैं, क्योंकि ईरान, इराक, सीरिया जैसे शिया-प्रभावी देश इसमें शामिल नहीं हैं। भारत के लिए वास्तव में अधिक गंभीर संकेत सितंबर 2025 के सऊदी-पाकिस्तान ‘म्यूचुअल डिफेंस’ समझौते से ही आता है। अल जजीरा की रिपोर्ट ने इसके होते ही साफ कर दिया था कि इसकी मूल भावना ‘एक पर हमला, दोनों पर हमला’ जैसी साझा सुरक्षा प्रतिबद्धता भारत के लिए खतरा है। इसके बाद 2026 जनवरी में यह खबर तेजी से उभरी कि तुर्किये इस ढांचे से जुड़ने की दिशा में बातचीत कर रहा है, तभी इसे ‘मुस्लिम नाटो’ जैसे नाम दिए गए।
यह संयोजन खतरनाक इसलिए माना जा रहा है, क्योंकि विश्लेषणों में इसे तीन पूरक ताकतों का मेल बताया गया है। तुर्किये का सैन्य-उद्योग, ड्रोन/तकनीक, युद्ध-अनुभव, पाकिस्तान की मिसाइल क्षमता साथ में परमाणु क्षमता और सऊदी अरब की वित्तीय शक्ति, प्रभावी अरब नेतृत्व, ऊर्जा-राजनीति आदि मिलकर इसे खतरनाक गठजोड़ बनाते हैं। हालांकि यह नाटो जितना संगठित नहीं हो सकता, फिर भी भारत के लिए गंभीर चुनौती साबित हो सकता है। यह भारत के लिए एक नहीं तीन स्तरों पर खतरा बन सकता है। पहला सैन्य खतरा दूसरा तुर्किये की पाकिस्तान को उन्नत सैन्य सहयोग का खतरा। इससे पाकिस्तान को टेक्नोलॉजी/ड्रोन/इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर जैसी क्षमताओं में गति मिल सकती है। सवाल है कि भारत को क्या करना चाहिए? सिर्फ बयान नहीं, ठोस रणनीति बनानी होगी। यह रणनीति चार स्तरों पर होनी चाहिए।
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भारत को चाहिए कि सऊदी के साथ नियमित रक्षा-खुफिया संवाद गहरा करें। साथ ही स्पष्ट करें कि भारत के खिलाफ किसी प्रॉक्सी/आतंकी संरचना के लिए जीरो टॉलरेंस ही साझेदारी की शर्त है। दूसरा स्तर तुर्किये पर ‘टार्गेटेड डिप्लोमेसी’ होनी चाहिए, जिसमें टेक/डिफेंस और कंटेनमेंट की साझेदारी होनी चाहिए। तुर्किये की ड्रोन/सेंसर/ईडब्ल्यू तकनीक पाकिस्तान तक पहुंचे तो भारत को काउंटर-ड्रोन नेटवर्क और एयर डिफेंस इंटीग्रेशन तेज करना होगा। तीसरे स्तर की रणनीति के तहत क्वाड के साथ मध्य पूर्व और ईस्ट कनेक्ट की रणनीति अपनानी चाहिए साथ ही भारत को यह मुद्दा ‘धर्म-आधारित गुट’ बनाकर नहीं देखना चाहिए, बल्कि इंडो-पैसिफिक स्थिरता की भाषा में बात बढ़ानी चाहिए। चौथा स्तर घरेलू सुरक्षा का होना चाहिए। प्रॉक्सी वॉर में हमें और सख्त होना होगा। कश्मीर/सीमा पर आईएसआर, ड्रोन-रोधी ढांचा, फेंसिंग सेंसर और टेरर फाइनेंस ट्रैकिंग मजबूत होनी चाहिए।
लेख-लोकमित्र गौतम के द्वारा






