
(डिजाइन फोटो)
रूस और यूक्रेन के बीच पिछले ढाई वर्ष से चल रहे विनाशकारी युद्ध को समाप्त करने की दिशा में प्रधानमंत्री मोदी ने सकारात्मक पहल का प्रस्ताव रखा है। प्रयास यही है कि दोनों देशों के नेता वार्ता की मेज पर आएं। दिसंबर 1991 में सोवियत संघ से यूक्रेन आजाद हुआ। उसके बाद से किसी भारतीय प्रधानमंत्री की यह पहली यूक्रेन यात्रा है।
मोदी गत 8 व 9 जुलाई को मास्को जाकर रूसी राष्ट्रपति पुतिन से मिले थे और उसके 6 सप्ताह बाद उन्होंने कीव जाकर यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की से भेंट की। इस तरह दोनों युद्धरत देशों के प्रमुखों से उनका सीधा संपर्क व संवाद हुआ। प्रधानमंत्री मोदी ने स्पष्ट कर दिया कि हम तटस्थ या निर्लिप्त नहीं हैं बल्कि शांति के पक्षधर हैं।
रूस के खिलाफ अमेरिका के नेतृत्व में पश्चिमी देशों ने प्रतिबंध लागू किए लेकिन भारत ने इस तरह के कदम से दूरी बरती। अमेरिका की नाराजगी की परवाह न करते हुए भारत देशहित में रूस से कच्चा तेल खरीदता रहा। यद्यपि भारत और रूस के बीच प्रदीर्घ सहयोग व रक्षा क्षेत्र में संबंधों का लंबा इतिहास रहा है फिर भी उसने रूस द्वारा की गई बमबारी में मासूम यूक्रेनी बच्चों की मौत पर गहरी चिंता जताई थी।
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मोदी ने पुतिन से कहा था कि यह युद्ध का युग नहीं है। इसका आशय था कि रूस की कार्रवाई की भारत अनदेखी नहीं कर रहा है। पश्चिमी देशों का भी इस पर ध्यान गया। भारत मानवीय आधार पर यूक्रेन को चिकित्सकीय सहायता भेजता रहा। रूस के खिलाफ यूएन के प्रस्तावों से भारत दूर रहा और उसने हमेशा इस बात पर जोर दिया कि संवाद और कूटनीति से ही शांति की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।
भारत चाहता है कि युद्ध समाप्त करने के उद्देश्य से पुतिन और जेलेंस्की में सीधी चर्चा हो। इस वर्ष जून में स्विटजरलैंड के बर्जेनस्टाक में यूक्रेन को लेकर हुई शिखर वार्ता में रूस को शामिल नहीं किया गया था। दोनों देशों के युद्ध में रूस भारी पड़ रहा था लेकिन अपने विनाश के बावजूद यूक्रेन पश्चिमी देशों के हथियारों की मदद से डटकर मोर्चा ले रहा था।
रूस द्वितीय विश्वयुद्ध में भी कुर्स्क क्षेत्र में नहीं हारा था लेकिन इस बार यूक्रेन ने उससे यह महत्वपूर्ण क्षेत्र छीन लिया। इसे गेमचेंजर कदम माना जा रहा है। तथ्य यह है कि यूक्रेन को पश्चिमी देश ही रूस से लड़ा रहे हैं। युद्ध तभी खत्म होगा जब अमेरिका, पश्चिमी देश और रूस एक साथ चर्चा करेंगे। फिलहाल अमेरिका अपने राष्ट्रपति चुनाव में व्यस्त है।
भारत के प्रयासों से यदि दोनों युद्धरत राष्ट्र चर्चा की मेज पर आ जाते हैं तो यह शांति की दिशा में एक अच्छी शुरूआत होगी। रूस से जितने अच्छे संबंध भारत के हैं वैसे किसी भी पश्चिमी देश के नहीं हैं। इतने पर भी यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत की तुलना में रूस हमेशा चीन की सलाह ज्यादा ध्यान से सुनता है।
लेख चंद्रमोहन द्विवेदी द्वारा






