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संपादकीय: 10 मिनट का बंधन हटने से गिग वर्कर्स को राहत
Gig Workers Rights India: केंद्रीय श्रम मंत्री के हस्तक्षेप से गिग वर्कर्स को बड़ी राहत मिल गई है। यहां पर 10 मिनट डिलीवरी की बाध्यता हटने से सुरक्षा, अधिकार और मानवीय कार्य परिस्थितियों की उम्मीद जगी
- Written By: दीपिका पाल

गिग वर्कर्स (सौ.सोशल मीडिया)
नवभारत डिजिटल डेस्क: केंद्रीय श्रम मंत्री मनसुख मांडविया के हस्तक्षेप की वजह २० से सुरक्षा व अधिकारों से वंचित डिलीवरी बॉय या गिग वर्कर्स के हित में एक अच्छा निर्णय लिया जा सका। इन युवाओं को जान पर खेलकर, सिग्नल जंप करते हुए आपाधापी में 10 मिनट में ग्राहक को डिलीवरी देनी पड़ती थी। यह बेहद जोखिम भरा काम था। अब यह अनिवार्य समय सीमा हटा दी गई है। इस संबंध में ब्लिंकिट, जेप्टो, जोमैटो व स्विगी सहित सभी प्रमुख क्विक कॉमर्स प्लेटफार्म के साथ बैठक हुई जिसमें गिग वर्कर्स की समस्याओं पर विचार किया गया।
पिछले महीने देश के 22 शहरों के 1,00,000 से ज्यादा गिग वर्कर्स ने हड़ताल की थी। उनकी यूनियनों का कहना था कि कंपनियां 10 मिनट में डिलीवरी के नाम पर श्रमिकों का शोषण कर रही हैं। रोज 12-14 घंटे काम करने के बाद भी कई वर्कर 25,000 रुपए मासिक से भी कम कमाते हैं। वे न्यूनतम वेतन, काम के निश्चित घंटे, ओवरटाइम व सामाजिक सुरक्षा की मांग कर रहे हैं। पिछले संसद सत्र में ‘आप’ के राज्यसभा सदस्य राघव चड्डा ने गिग वर्कर्स की पीड़ा व कठिनाइयों का मुद्दा उठाया था। वर्तमान समय में उपभोक्ता और निवेशकर्ता दोनों ही चाहते हैं कि तेजी से सामान की डिलीवरी हो। 10 मिनट में सामान पहुंचाने की बाध्यता के कारण कितने ही ट्रैफिक एक्सीडेंट हुए हैं जिनमें डिलीवरी बॉय या अन्य राहगीर घायल हुए या मौत के मुंह में गए हैं।
यदि 10 मिनट में सामान नहीं पहुंचा तो ग्राहक पर कोई पहाड़ नहीं टूट पड़ता। लोगों ने अपनी वास्तविक आवश्यकताओं और इच्छाओं में फर्क करना बंद कर दिया है। उनके मन में कोई इच्छा हुई तो सामान तुरंत चाहते हैं। गिग वर्कर इसलिए जल्दबाजी करते हैं क्योंकि विलंब होने से उनकी रेटिंग पर असर पड़ता है। कितने ही लोग घर में खाना पकाने की बजाय ऑर्डर देकर तत्काल बाहर से खाना मंगाते हैं। ऐसे ही कोई ड्रेस, सजावट की सामग्री, दवाइयां, कॉस्मेटिक्स, सब्जियां, फल, किराणा आदि घर बैठे मंगाने का चलन बढ़ गया है, जिससे ई-कॉमर्स प्लेटफार्म का व्यवसाय बढ़ा है। घर पहुंच सेवा का वॉल्यूम बहुत बढ़ गया है।
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मिसाल के तौर पर ब्लिंकिट की हिस्सेदारी 46 प्रतिशत हो गई है जिसके 62 लाख सक्रिय यूजर्स हैं तथा औसत ऑर्डर मूल्य प्रति ग्राहक 625 रुपये है। लोगों ने दुकानों में जाना कम कर दिया है। सभी शहरी लोगों को घर बैठे सामान चाहिए। भारत का क्विक कॉमर्स मार्केट 755 करोड़ रुपये तक जा पहुंचा है। रिटेल में ऑनलाइन किराणा (ग्रॉसरी) का 70 फीसदी घर बैठे मंगाया जाता है। रोज 30 से 50 लाख ऑर्डर आते हैं जो छुट्टी के दिन और त्योहारों में बढ़ जाते हैं। देश में लगभग 3,000 डार्क स्टोर्स या छोटे गोदाम हैं जो ऑनलाइन ऑर्डर पूरा करते हैं। कंपनियां 30,000 से ज्यादा प्रोडक्ट ग्राहक के दरवाजे पर पहुंचाने को तत्पर रहती हैं। इसमें गिग वर्कर्स की बड़ी भूमिका है। इसलिए वे न्याय व सुविधा के हकदार हैं।
लेख-चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा
Gig workers 10 minute delivery rule removed mandaviya intervention
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