

New Labour Codes Overtime Rules: देश के करोड़ों लोग ऑफिस में अपनी शिफ्ट पूरा होने के बाद भी हसल (Hustle) के नाम पर घंटों तक एक्सट्रा काम करते हैं। लोग अक्सर इसे करियर की मजबूरी या कंपनी के प्रति वफादारी मान लेते हैं। हालांकि, कानून की नजर में आपका यह अतिरिक्त समय भी कीमती है। भारत का लगभग 60 करोड़ वर्कफोर्स, जिसमें बड़ी संख्या युवाओं की है, जो अक्सर ज्यादा कमाई की होड़ में अपने स्वास्थ्य के साथ-साथ आर्थिक नुकसान भी झेलते हैं।
इसी 'सेल्फ इक्सप्लॉइटेशन' और कंपनियों की मनमानी पर रोक लगाने के लिए सरकार ने नए लेबर कोड के जरिए ओवरटाइम के नियमों में कई बदलाव किए है। अब न केवल काम के घंटों की सीमा तय होगी, बल्कि आपकी मर्जी और डबल सैलरी का हक भी कानून के तहत तय होगा।
इससे पहले ओवरटाइम और काम के घंटों से जुड़े नियम अलग-अलग कानूनों और राज्यों के हिसाब से तय होता रहा था। किसी जगह फैक्ट्री एक्ट लागू होता था, तो कहीं शॉप्स एंड एस्टेब्लिशमेंट एक्ट, जिससे काफी भ्रम रहता था। बिजनेस स्टैंडर्ट की रिपोर्टे के अनुसार, Helo.ai की को-फाउंडर और CHRO राधिका रायचूरा ने बताया कि नए लेबर कोड, विशेष रूप से 'कोड ऑन वेजेजे' और ‘ऑक्युपेशनल सेफ्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशंस कोड’ के जरिए इन नियमों को एक कैटेगरी में रख दिया गया है। राधिका का साफ कहना है कि नए लेबर कोड ओवरटाइम से जुड़े अधिकार कम नहीं करते, बल्कि नियमों को ज्यादा स्पष्ट और एक जैसा बनाते हैं। उनका मकसद यह है कि कंपनियों के लिए नियमों को पालन करना आसान हो जाता है और हर सेक्टर में कर्मचारियों को बराबर सुरक्षा मिले।
गौरतलब है कि प्राइवेट सेक्टर में अक्सर ज्यादा काम के नाम पर 10 से 12 घंटे काम करना आम बात बन गई है, लेकिन नया नियम इस पर रोक लगाने की कोशिश कर रहा है। KEKA के CRO तपन आयार्य का कहना है कि अगर बिना सीमा के ऐसे ही काम चलता रहा, तो 40-50 की उम्र तक पहुंचते-पहुंचे कई लोग गंभीर बीमारियों का शिकार हो सकते हैं। इससे इंश्योरेंस क्लेम का बोझ इतना बढ़ सकता है कि कंपनियों और पूरे हेल्थकेयर सिस्टम पर दबाव आ जाएगा। उन्होंने कहा कि हर रोज 8 घंटे और हफ्ते में 48 घंटे का नियम अभी भी लागू है। उनके मुताबिक, अगर काम बार-बार इन सीमाओं से ज्यादा जा रहा है, तो इसका मतलब यह नहीं कि कर्मचारी कम मेहनती है, बल्कि कंपनी की काम की योजना यानी कैपेसिटी प्लानिंग में कमी है।
तपन आगे कहते हैं कि अब कंपनियों को काम के घंटों पर ज्यादा ध्यान रखना होगा और उन्हें ठीक से ट्रैक करना होगा। खासकर फील्ड और शिफ्ट में काम करने वालों के लिए जियो-फेंसिंग और रीयल-टाइम अटेंडेंस जैसे सिस्टम अब सिर्फ सुविधा नहीं रहेंगे, बल्कि नियमों का पालन करने के लिए जरूरी होते जा रहे हैं। ऐसे में कंपनियां यह नहीं कर सकतीं की उन्हें कर्मचारियों के काम के घंटों की जानकारी नहीं थी। पैसे के मामले में कर्मचारियों के लिए राहत की बात यह है कि ओवरटाइम पर मिलने वाली दोगुनी मजदूरी के नियमों में किसी तरह का बदलाव नहीं हुआ है। राधिका रायचूरा के मुताबिक, तय समय से ज्यादा काम करने पर कर्मचारी को सामान्य दर से दोगुना भुगतान पाने का हक पूरी तरह बना हुआ है, और नियमों के हिसाब से यह सुरक्षा पहले की तरह ही लागू रहती है।
तपन आचार्य एक अहम बदलाव की ओर ध्यान दिलाते हैं। उनके मुताबिक अब ‘मजदूरी’ यानी वेतन की परिभाषा ज्यादा साफ और सख्त कर दी गई है। पहले कुछ कंपनियां सैलरी के अलग-अलग हिस्सों में बदलाव करके ओवरटाइम का असली भुगतान कम कर देती थीं, लेकिन अब नियम साफ होने से ऐसी गुंजाइश काफी कम हो गई है।
तपन का कहना है कि अब ओवरटाइम को जरूरी नहीं, बल्कि एक विकल्प की तरह देखा जा रहा है। कंपनियों को कर्मचारियों की सहमति का ध्यान रखना होगा और ऐसा माहौल नहीं बना सकते जहां अतिरिक्त काम अपने आप तय मान लिया जाए। साथ ही अगर अटेंडेंस, ओवरटाइम और पेरोल सिस्टम आपस में ठीक से जुड़े नहीं होंगे, तो गलतियां हो सकती हैं और नए नियमों में उन्हें सही ठहराना मुश्किल होगा।