Navabharat Nishanebaaz: क्यों याद आने लगा पुराना गाना, बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना

Begani Shaadi Abdullah: एकनाथ शिंदे के 'बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना' वाले तंज के बाद इस कहावत की चर्चा तेज है। जानिए आखिर यह 'अब्दुल्ला' कौन है और इस मुहावरे का असली मतलब क्या है।
Navabharat Nishanebaaz: Why the old song "Begani shaadi mein Abdullah deewana" is coming to mind.
(सोर्स: नवभारत डिजाइन फोटो)
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Begani Shaadi Idiom Meaning: पड़ोसी ने कहा, 'निशानेबाज, महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने ठाकरे बंधुओं उद्धव और राज पर हमला बोलते हुए कहा कि छात्रों ने अपना आंदोलन वापस ले लिया है लेकिन कुछ लोग इस बहाने अपनी राजनीति चमकाने में लगे हैं। उनकी स्थिति बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना जैसी हो गई है। निशानेबाज, बताइए कि यह अब्दुल्ला कौन है? हमने शेख मोहम्मद अब्दुल्ला, फारूक अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला के नाम सुने थे लेकिन यह कौन सा अब्दुल्ला है जो बिना निमंत्रण मिले, अनजाने लोगों के यहां शादी में जा धमकता है? क्या उसे वहां से खदेड़ दिया जाता है?'

हमने कहा, 'दरअसल यह गीत राजकपूर की फिल्म 'जिस देश में गंगा बहती है' का है। इस फिल्म में राजू (राजकपूर) डाकुओं की बस्ती में पहुंच जाता है जो उसे पुलिस का भेदिया या मुखबिर समझते हैं फिर वह वहीं ठहर जाता है और क्रूर डाकुओं को शांति और अहिंसा की सीख देने लगता है। डाकू सरदार की बेटी (पद्मिनी) उससे प्रेम करने लग जाती है और गाने लगती है-बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना, ऐसे मनमौजी को मुश्किल है समझाना!'

पड़ोसी ने कहा, 'निशानेबाज, शादी के शानदार रिसेप्शन में भी कुछ अनजान लोग ग्रुप बनाकर दावत का मजा लेने घुस जाते हैं और डटकर पेटपूजा करते हैं। लड़की वाले समझते हैं कि यह लोग लड़के वालों की तरफ से आए हैं और लड़के वाले सोचते हैं कि यह लोग लड़की वाले या कन्यापक्ष के होंगे। ऐसे मुफ्तखोरों को पकड़ना मुश्किल है। क्योंकि यह 100 रुपये का लिफाफा टिकाकर हजार रुपये का माल खा जाते हैं। आपने फिल्म श्री इडियट्स में देखा होगा कि आमिरखान और उसके दोनों दोस्त कैसे शादी में घुसकर खाना खाते पकड़े जाते हैं और उन्हें वहां से भागने की नौबत आ जाती है।'

हमने कहा, 'चालाक लोग मौका पाकर कहीं भी घुसपैठ करते हैं। वह हमेशा अवसर की ताक में रहते हैं। आज की राजनीति में गद्दार, खुद्दार और ईमानदार को पहचान पाना कठिन हो गया है क्योंकि लोग गिरगिट के समान रंग बदलते हैं। आपने गीत सुना होगा इस रंग बदलती दुनिया में इंसान की नीयत ठीक नहीं, निकला ना करो तुम सज-धज के, ईमान की नीयत ठीक नहीं!'

लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

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