

Path of True Devotion: आध्यात्मिक मार्ग पर चलने वाले साधकों के मन में अक्सर यह प्रश्न उठता है कि भगवान को सबसे अधिक क्या प्रिय है। क्या कठोर तपस्या, व्रत, जप, योग या बड़े-बड़े यज्ञ? श्री प्रेमानंद जी महाराज के अनुसार, श्रीकृष्ण इन सभी साधनों से उतने प्रसन्न नहीं होते, जितने अनन्यता से होते हैं। अनन्यता यानी ऐसा भाव, जिसमें भक्त के लिए भगवान के अलावा कोई दूसरा सहारा न हो।
अनन्यता का अर्थ है पूर्ण समर्पण। जैसे मीरा बाई का भाव था कि "गिरिधर गोपाल के अलावा मेरा कोई नहीं है"। ऐसा भक्त, जिसने केवल प्रभु का आश्रय लिया हो, भले ही उसकी इंद्रियां अभी पूर्ण रूप से संयमित न हों, फिर भी वह करोड़ों कर्मकांड करने वालों से श्रेष्ठ माना जाता है। क्योंकि उसने अपने जीवन का आधार केवल भगवान को बनाया है।
अक्सर हम सोचते हैं कि हम भगवान का सहारा ले रहे हैं, लेकिन भीतर से हमारा भरोसा धन, शरीर, रिश्तों और अपनी बुद्धि पर होता है। वास्तविक भगवत आश्रय तब शुरू होता है, जब यह समझ आ जाए कि ईश्वर अहंकार या व्यक्तिगत प्रयास से नहीं, बल्कि केवल अपनी कृपा से मिलते हैं। निरंतर नाम-जप करने वाला भक्त भी तभी आगे बढ़ता है, जब उसमें अपने साधन का अभिमान न हो।
प्रेमाभक्ति का बीज बिना किसी भगवत्प्रेमी महात्मा के आश्रय के अंकुरित नहीं होता। शास्त्र स्पष्ट कहते हैं कि न तो केवल वेद पढ़ने से और न ही घर-बार त्यागने से ईश्वर की प्राप्ति होती है। इसका एकमात्र उपाय है संतों के चरणों की धूल का सेवन, यानी उनके आदेशों के अनुसार जीवन जीना। यही सेवा अहंकार को नष्ट कर दैन्य को प्रकट करती है, जो भगवान के हृदय को जीत लेती है।
श्री रघुनाथ दास गोस्वामी का जीवन इस मार्ग का जीवंत उदाहरण है। अपार धन-संपत्ति में जन्म लेने के बावजूद उनका मन बचपन से ही संसार में नहीं रमा। ठाकुर हरिदास जी के प्रभाव से उनके हृदय में श्रीकृष्ण नाम बस गया। परिवार ने जब उन्हें वैभव और सुंदर पत्नी के बंधन में बांधना चाहा, तो उन्होंने इसे "धन का कारागार" माना। श्री चैतन्य महाप्रभु ने उन्हें पहले "मर्कट वैराग्य" से बचने की सलाह दी और समय आने पर, वे सब बंधनों को तोड़कर जगन्नाथ पुरी की ओर नंगे पांव दौड़ पड़े।
आज के युग में हर हाथ में मौजूद "मोबाइल भगवान" ने चरित्र और संस्कारों को कमजोर किया है। सच्ची प्रगति भोग में नहीं, बल्कि पवित्रता और वैराग्य में है। शास्त्रों और संतों का सार यही है वृंदावन के स्वामी का आश्रय लो, नाम-स्मरण करो और संतों की निष्कपट सेवा करो। यही मार्ग संसार-सागर से पार ले जाता है।