भारत का अनोखा मंदिर: जहां पहले होती है शादी और अगले ही दिन मनाया जाता है मौत का मातम

Aravan Tamil Nadu Temple: मंदिरों और पूजा-स्थलों को लेकर लोगों की गहरी आस्था है। देश का लगभग हर मंदिर अपने साथ कोई न कोई पौराणिक कथा और रहस्य समेटे हुए है। ऐसा ही एक महाभारत से जोड़ा मंदिर है।
India's unique temple: where weddings are held first, and the very next day, mourning for death is observed Koothandavar Temple
Koothandavar Temple (Source. Facebook)
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Koothandavar Temple: हिंदू धर्म में मंदिरों और पूजा-स्थलों को लेकर लोगों की गहरी आस्था रही है। देश का लगभग हर मंदिर अपने साथ कोई न कोई पौराणिक कथा और रहस्य समेटे हुए है। भक्त अपने दुख-दर्द, परेशानियों और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए भगवान की शरण में पहुंचते हैं। भारत में कई ऐसे मंदिर भी हैं, जो अपनी अनोखी परंपराओं के कारण दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं। ऐसा ही एक रहस्यमयी और अनोखी परंपरा वाला मंदिर तमिलनाडु में स्थित है, जहां पहले विवाह होता है और फिर उसके बाद मृत्यु का मातम मनाया जाता है।

कहां स्थित है यह अनोखा मंदिर?

तमिलनाडु के कूवगम गांव में स्थित अरावन मंदिर को कूथंडावर मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। यह मंदिर महाभारत काल के महान योद्धा और अर्जुन के पुत्र अरावन को समर्पित है। मान्यता है कि अरावन ने देवताओं की विजय के लिए स्वयं का बलिदान दिया था। इसी कारण किन्नर समाज उन्हें अपना आराध्य देव मानता है। यह मंदिर विशेष रूप से किन्नर समुदाय की आस्था का केंद्र माना जाता है।

18 दिनों तक चलता है विशेष उत्सव

कूथंडावर मंदिर में हर साल तमिल माह चिथिरई (अप्रैल-मई) में 18 दिनों तक एक भव्य और अनोखा उत्सव आयोजित किया जाता है। इस दौरान देशभर के अलग-अलग राज्यों से किन्नर समाज के लोग यहां पहुंचते हैं। यह उत्सव अपनी पौराणिक कथा, भावनात्मक परंपराओं और सामाजिक संदेश के कारण खास माना जाता है। इन 18 दिनों में मंदिर परिसर में कई धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियां भी होती हैं।

पहले शादी और फिर मातम क्यों मनाया जाता है?

इस परंपरा के पीछे महाभारत से जुड़ी गहरी कथा है। मान्यता के अनुसार, मां काली को प्रसन्न करने के लिए पांडवों को नरबलि की आवश्यकता थी। इसके लिए अर्जुन के पुत्र अरावन ने स्वेच्छा से बलिदान देने का निर्णय लिया। हालांकि, उनकी एक शर्त थी कि वे कुंवारे नहीं मरना चाहते। अरावन की इस शर्त के कारण कोई भी राजा अपनी पुत्री का विवाह उनसे करने को तैयार नहीं हुआ।

ऐसे में स्वयं भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर अरावन से विवाह किया। अगले ही दिन अरावन का बलिदान हुआ और मोहिनी रूप में भगवान विष्णु ने उनकी मृत्यु पर विलाप किया। इसी कथा के आधार पर किन्नर समाज हर वर्ष अरावन से प्रतीकात्मक विवाह करता है और अगले दिन उनकी मृत्यु का शोक मनाता है।

चूड़ियां तोड़कर व्यक्त किया जाता है शोक

उत्सव के दौरान किन्नर अरावन से विवाह रचाते हैं और अगले दिन मंदिर में चूड़ियां तोड़कर विलाप करते हैं। यह विलाप अरावन के उस महान बलिदान को समर्पित होता है, जिसमें उन्होंने दूसरों के हित के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। इसके साथ ही इस उत्सव में सौंदर्य, नृत्य और गायन से जुड़ी कई रोचक प्रतियोगिताएं भी आयोजित की जाती हैं, जिनमें किन्नर समाज पूरे उत्साह से भाग लेता है।

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