
पिता-पुत्र (सौ.सोशल मीडिया)
Father Alive Son Duties: हिंदू धर्म ग्रथों में माता-पिता देवतुल्य माना गया है जो हमें जीवन देने, संस्कार देने और पालन-पोषण करने के कारण सर्वोच्च स्थान रखते है। जहां मां के चरणों में अगर स्वर्ग बताया गया है, तो पिता को उस स्वर्ग की सीढ़ी माना गया है। हिंदू परिवार में पिता का स्थान बहुत सर्वोच्च माना जाता है। पिता और पुत्र का संबंध बहुत पवित्र माना गया है।विशेषकर ये आवश्यक माना गया है कि एक पुत्र अपने पिता का सम्मान और समाजिक व्यवस्था बनाए रखे।
मनु स्मृति और गरुड़ पुराण जैसे धर्मग्रंथों में साफ तौर पर कुछ ऐसे काम बताए गए हैं, जिनको एक पुत्र को पिता के जीवित रहते हुए नहीं करना चाहिए। ये सिर्फ धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सामाजिक रूप से भी उचित है। ऐसे में आइए शास्त्रों के अनुसार, उन कामों के बारे में जानते हैं, जिनको पिता के जीवित रहते हुए पुत्र को करने से मना किया गया है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पिता जीवित होने पर पुत्र को पिंडदान, श्राद्ध या तर्पण जैसे कर्म नहीं करने चाहिए। ये कर्म मृत पितरों के लिए विशेष रूप से निर्धारित हैं। जीवित पिता के रहते इसे करना अशुभ माना जाता है।
शास्त्रों में यह भी बताया गया है कि पिता के रहते पुत्र को विवाह, संपत्ति बंटवारा या गृहत्याग जैसे बड़े निर्णय नहीं लेने चाहिए। ऐसा करने से पारिवारिक असंतुलन और मानसिक क्लेश की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
पिता की अवज्ञा, नाराजगी या तिरस्कार को गंभीर पाप माना गया है। ऐसा करने से जीवन में विघ्न, धन हानि और मान-सम्मान की कमी होने की संभावना रहती है।
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पुत्र द्वारा किए जाने वाले दान-पुण्य, व्रत या धार्मिक संकल्प में पिता की अनुमति और उनका सम्मान आवश्यक है। शास्त्रों के अनुसार पिता की सेवा स्वयं में महान पुण्य का स्रोत है।
पिता की सेवा और आज्ञा का पालन करने से पुत्र को दीर्घायु, यश और सफलता प्राप्त होती है। यह जीवन में स्थायी सुख-समृद्धि का आधार माना जाता है।






