घर में लड़ाई-झगड़ा क्यों होता है? श्री प्रेमानंद जी महाराज के अमृत वचन जो बदल सकते हैं आपका जीवन

Arguments Conflicts At Home: घर-परिवार से लेकर समाज तक, तनाव और लड़ाई-झगड़े आम हो गए हैं। ऐसे में आध्यात्मिक शांति कैसे मिले, इसे लेकर संतों के वचन मार्गदर्शन देते हैं। प्रेमानंद जी महाराज बताते है।
conflicts and arguments happen in the home The inspiring words of Shri Premanand Ji Maharaj that can change your life.
Premanand Ji Maharaj (Source. Pinterest)
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Premanand Ji Maharaj Ki Baat: आज के समय में घर-परिवार से लेकर समाज तक, तनाव और लड़ाई-झगड़े आम हो गए हैं। ऐसे में आध्यात्मिक शांति कैसे मिले, इसे लेकर संतों के वचन मार्गदर्शन देते हैं। प्रसिद्ध संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के उपदेश बताते हैं कि यदि जीवन में स्थिरता, शांति और ईश्वर की अनुभूति चाहिए, तो सबसे पहले विवादों से दूरी बनानी होगी।

विवाद से दूरी ही आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग

श्री प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं कि साधक के जीवन का सबसे अमृतमय उपदेश यही है कि "कभी विवाद में न पड़ो"। जिस तरह आप अपने ईष्ट और अपने धर्म को सर्वोच्च मानते हैं, उसी तरह दूसरा व्यक्ति भी अपनी आस्था को सर्वोपरि मानता है। किसी दूसरे के देवता या विश्वास की निंदा करना, अंततः अपनी ही आस्था को कमजोर करना है। ईश्वर एक है और वही सभी धर्मों के गुरु और प्रियतम हैं।

हर रूप में ईश्वर को पहचानना

सच्ची भक्ति वही है, जिसमें हर व्यक्ति और हर परिस्थिति में भगवान के दर्शन हों। यदि कोई आपको अपमानित करता है या कष्ट देता है, तो यह समझिए कि यह भी आपके आराध्य देव का ही एक रूप है, जो आपके कर्मों की शुद्धि के लिए आया है। जैसे बहन अपने भाई को शेर का मुखौटा पहनकर देखकर नहीं डरती, क्योंकि उसने उसे मुखौटा पहनते देखा है, वैसे ही भक्त को संसार के मुखौटों से भय नहीं करना चाहिए।

आत्मा का सत्य और भय से मुक्ति

महाराज बताते हैं कि हर स्त्री, पुरुष, संत या दुष्ट व्यक्ति के भीतर एक ही परम तत्व विद्यमान है। आत्मा जल में उठे बुलबुले की तरह है, जो ईश्वर से उत्पन्न होती है, ईश्वर में रहती है और अंततः उसी में विलीन हो जाती है। यदि आप बाहरी व्यवहार के बजाय इस आंतरिक सत्य को देखना सीख लें, तो जीवन से भय, शोक और अशांति स्वतः समाप्त हो जाती है।

साधना की कमाई को कैसे बचाएं

कई लोग जीवनभर साधना करते हैं, फिर भी हृदय में शांति नहीं पाते। इसका कारण है इंद्रियों की असंयमित प्रवृत्ति। जैसे खेत में चूहे सुराख कर पानी बहा देते हैं, वैसे ही विषय-भोग, कीर्ति और मान-सम्मान की चाह साधना की सारी पूंजी नष्ट कर देती है। साथ ही, कुसंगति उस बकरी की तरह है जो भक्ति के छोटे पौधे को भी खा जाती है।

नाम जप की अद्भुत शक्ति

हृदय की शुद्धि का सबसे सरल और प्रभावी उपाय है ईश्वर के नाम का जप। ऊँचे स्वर में कीर्तन और नाम स्मरण करने से काम, क्रोध और लोभ जैसे विकार दूर भागते हैं। जैसे दो पत्थरों के रगड़ से अग्नि उत्पन्न होती है, वैसे ही "राधा राधा" का निरंतर जप भीतर आध्यात्मिक शक्ति जगा देता है।

धैर्य और एकनिष्ठता का महत्व

ईश्वर प्राप्ति का मार्ग धैर्य मांगता है। बहुत से साधक थोड़ा आगे बढ़कर रास्ता बदल लेते हैं, ठीक वैसे ही जैसे कुआं खोदते समय पानी से एक फुट पहले रुक जाना। श्री प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं एक गुरु, एक मंत्र और एक मार्ग को दृढ़ता से पकड़ो। गुरु इंजन की तरह हैं और शिष्य डिब्बों की तरह। यदि नाम का टिकट आपके पास है और आप गुरु से जुड़े हैं, तो मंज़िल निश्चित है।

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