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नवभारत डेस्क : सात सितंबर को गणेश चतुर्थी के दिन से शुरू हुए गणेशोत्सव महापर्व का समापन 17 सितंबर को अनंत चतुर्दशी के दिन गणेश विसर्जन के साथ हो जाएगा। अनंत चतुर्दशी का पर्व भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है। गणेश विसर्जन के अतिरिक्त यह पर्व भगवान श्री विष्णु को समर्पित है, जिन्हें जगत के पालनहार के रूप में जाना जाता है।
अनंत चतुर्दशी के दिन व्रत रखकर भगवान विष्णु के अनंत रूपों की पूजा-अर्चना करने का विधान है, इसलिए इसे अनंत चतुर्दशी कहा जाता है। इसे चौदस के नाम से भी जाना जाता है। हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करने से साधकों को शुभ फल की प्राप्ति होती है तथा उनकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। अनंत चतुर्दशी के दिन गणपति बप्पा का विसर्जन भी किया जाता है। यह दस दिनों तक मनाए जाने वाले गणेश उत्सव का अंतिम दिन भी है।
अनंत चतुर्दशी की शुभ तिथी पर चौदह गांठों वाला अनंत सूत्र अर्थात पीला धागा बांधने का विधान भी है। इसे बांधना शुभ माना जाता है। हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह सूत्र हमारी हर संकट से रक्षा करता है। ऐसी मान्यता भी है कि इस सूत्र को बांधने से आत्मविश्वास बढ़ता है और साधक को सभी कष्टों से मुक्ति मिलती है। अनंत चतुर्दशी के दिन विभिन्न कामनाओं की पूर्ति के लिए साधक व्रत भी करते हैं।
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पौराणिक कथाओं के अनुसार, पांडवों ने कौरवों के साथ खेले गए जुए के खेल में अपना सारा धन और वैभव खो दिया था। इसके परिणामस्वरूप उन्हें 12 वर्षों के वनवास के लिए जाना पड़ा। इस समयावधि में पांडवों को वन-वन भटकना पड़ा और कई परेशानियों का सामना करना पड़ा। एक बार जब धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान कृष्ण से पूछा कि इस कठिन समय से बाहर कैसे निकला जाए तब भगवान कृष्ण ने युधिष्ठिर जी को इसका उपाय बताते हुए भगवान अनंत की पूजा और व्रत करने के लिए कहा। भगवान कृष्ण के कहे अनुसार पांडवों ने पूरे विधि-विधान से भगवान अनंत की पूजा-अर्चना की जिससे उन्हें उनकी खोई हुई संपत्ति, वैभव और राज्य वापस मिल गए।