
Mahabharat Arjun and Krishna (Source. Pinterest)
Mahabharata Ki Kahani Main Arjun: महाभारत की कहानियां हम बचपन से सुनते और पढ़ते आए हैं। यह महाकाव्य केवल युद्ध की कथा नहीं, बल्कि जीवन, रिश्तों, मर्यादा, प्रेम, अन्याय और धर्म के गहरे संदेश देता है। पांडवों के बीच आपसी प्रेम और एकता को हमेशा आदर्श माना गया है, लेकिन महाभारत में एक ऐसा प्रसंग भी आता है, जब इन्हीं पांडव भाइयों के बीच हालात इतने बिगड़ गए कि अर्जुन युद्ध छोड़कर आत्महत्या करने निकल पड़े। इस घटना की जड़ में कर्ण, युधिष्ठिर का क्रोध और अर्जुन का कठोर प्रण था।
महाभारत युद्ध के दौरान कुंती पुत्र कर्ण, दुर्योधन के पक्ष से युद्ध लड़ रहे थे और पांडवों के लिए सबसे बड़ा संकट बने हुए थे। कर्ण पांडवों की सेना को लगातार नुकसान पहुंचा रहे थे। इसी बीच युधिष्ठिर स्वयं कर्ण से युद्ध करने कुरुक्षेत्र पहुंचे। युद्ध में कर्ण ने युधिष्ठिर को गंभीर रूप से घायल कर दिया। उनके सारथी उन्हें तुरंत युद्धभूमि से बाहर ले गए।
युधिष्ठिर को विश्वास था कि अब अर्जुन कर्ण का वध कर देंगे। जब अर्जुन और श्रीकृष्ण घायल युधिष्ठिर से मिलने पहुंचे, तो युधिष्ठिर को लगा कि कर्ण मारा जा चुका है। लेकिन जैसे ही उन्हें पता चला कि कर्ण अभी जीवित है, वे क्रोध से भर उठे। गुस्से में उन्होंने अर्जुन से कहा, “तुम अपने शस्त्र किसी और को दे दो. यह तुम्हारे किसी काम के नहीं है।”
महाभारत के अनुसार अर्जुन ने पहले ही यह प्रतिज्ञा ले रखी थी कि यदि कोई उनसे अपने शस्त्र किसी और को देने को कहेगा, तो वह उसका सिर काट देंगे। युधिष्ठिर की बात सुनकर अर्जुन का प्रण जाग उठा और उन्होंने तलवार उठा ली।
तभी श्रीकृष्ण ने स्थिति संभाली और अर्जुन को समझाया कि बड़े या बुजुर्ग का अपमान करना भी हत्या के समान है। उन्होंने उपाय बताया कि युधिष्ठिर की हत्या करने के बजाय उनका अपमान कर दो, इससे प्रण भी टूटेगा नहीं और भाई की जान भी बच जाएगी। श्रीकृष्ण की बात मानकर अर्जुन ने युधिष्ठिर को कठोर शब्द कहे और उनका अपमान किया।
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अर्जुन के शब्दों से युधिष्ठिर को गहरी ठेस पहुंची। तब श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को अर्जुन के प्रण के बारे में बताया और स्पष्ट किया कि यह सब उनके कहने पर हुआ है। सच्चाई जानकर युधिष्ठिर ने अर्जुन को माफ कर दिया।
लेकिन अर्जुन अपने व्यवहार से इतने दुखी और शर्मिंदा थे कि वे युद्ध छोड़कर आत्महत्या करने चल पड़े। तब श्रीकृष्ण ने उन्हें रोका और कहा, “खुद की तारीफ करो क्योंकि ऐसा करना आत्महत्या के ही समान है।” इस तरह श्रीकृष्ण की बुद्धि और मार्गदर्शन से एक बड़ा अनर्थ टल गया और अर्जुन फिर से युद्ध के लिए तैयार हुए।






