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पॉलिटिकल किस्सा: नीतीश बाबू ऐसे बदलते चले आए बिहार की सियासी फिजा, राजनीतिक युद्ध में उनके निजी ड्राइवर ने ही दिया था झटका
- Written By: विकास कुमार उपाध्याय
Bihar Political Story: 1977 की कहानी उस दौर की है, जब जनता पार्टी चर्चा में थी, लेकिन विडंबना यह है कि यह वह समय था, जब बिहार के सुशासन बाबू नीतीश कुमार चुनावी हार के दौर से गुजर रहे थे।

नीतीश कुमार, फोटो - सोशल मीडिया
नवभारत डिजिटल डेस्क : भारत-पाकिस्तान युद्धविराम के बाद तनाव भरी माहौल खत्म हो गई है। इस बीच अब बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर बिहार में फिर से हलचल बढ़ने लगी है। सियासी गलियारों का पारा धीरे-धीरे चढ़ने लगा है। यहां की पॉलिटिकल पार्टियां स्थगित चुनावी रैलियां और निर्धारित कार्यक्रम के लिए फिर से प्लानिंग करने लगे हैं।
इस बीच बिहार के राजनीतिक परिदृश्य पर पुरानी यादें ताजा करते हुए राजद नेता शिवानंद तिवारी ने हाल ही में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से जुड़ी एक कहानी सुनाई है, जो जनता पार्टी में उनके दिनों की है। अपने फेसबुक पेज पर लिखी कहानी में उन्होंने उस समय का जिक्र किया है, जब दोनों न केवल पार्टी के साथी थे, बल्कि उनके बीच गहरी दोस्ती भी थी।
1977 की कहानी उस दौर की है, जब जनता पार्टी चर्चा में थी, लेकिन विडंबना यह है कि यह वह समय था, जब बिहार के सुशासन बाबू नीतीश कुमार चुनावी हार के दौर से गुजर रहे थे, जिसकी वजह से वे बहुत प्रभावित हुए। चुनाव में नीतीश कुमार की हार के बावजूद शिवानंद तिवारी उनके साथ खड़े रहे।
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युवा जनता के अध्यक्ष बने नीतीश
शिवानंद तिवारी और नीतीश कुमार लोहिया विचार मंच में सक्रिय रूप से शामिल थे। आपको बता दें कि यह वह दौर था, जब शिवानंद तिवारी जनता पार्टी की युवा शाखा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे, जिसमें बिहार में मंगनी लाल मंडल विंग का नेतृत्व कर रहे थे। उन्होंने बिहार में युवा जनता के लिए एक समानांतर समिति के गठन की घोषणा की, जिसमें नीतीश कुमार को राज्य अध्यक्ष नियुक्त किया गया।
नीतीश कुमार के राज्य अध्यक्ष के इस फैसले ने न केवल नीतीश कुमार को एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान किया, बल्कि यहीं से नीतीश कुमार की राजनीतिक परिदृश्य की दृश्यता की शुरुआत हुई।
निजी ड्राइवर से हारे थे चुनाव
यह एक ऐसा सफर है जो नीतीश कुमार की जेपी आंदोलन में सक्रिय भागीदारी से शुरू हुआ, जब उन्होंने 26 साल की उम्र में नालंदा जिले की हरनौत सीट से जनता पार्टी के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा। वे अपने शुरुआती राजनीतिक संघर्ष में अपने निजी ड्राइवर भोला सिंह से ही चुनाव हार गए थे।
नीतीश कुमार 1980 में निर्दलीय उम्मीदवार अरुण कुमार सिंह से चुनाव हार गए। उन्होंने 1985 में फिर से चुनावी जुआ खेला और लगभग 21,000 वोटों के अंतर से जीत हासिल की, जो उनके राजनीतिक उत्थान की शुरुआत थी।
आपको जानकारी के लिए बताते चलें कि 1985 में आखिरी बार विधानसभा चुनाव लड़ने के बावजूद, नीतीश कुमार बिहार की राजनीति में अपनी छाप छोड़ते रहे और एमएलसी की कुर्सी तक पहुंचे। तब से वे बिहार की राजनीति के बादशाह बने हुए हैं। इस साल के अंत में होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव में सुशासन बाबू फिर से अपनी बादशाहत कायम रखते हैं या बिहार के सीएम के तौर पर कोई नया चेहरा देखने को मिलता है। ये तो चुनाव आयोग के नतीजे आने के बाद ही पता चलेगा।
Nitish kumar changes political atmosphere of bihar personal driver shock in political war
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