विशेषज्ञों का मानना है कि यह बयान केवल किसी व्यक्ति पर हमला नहीं, बल्कि पाकिस्तान की राजनीतिक व्यवस्था में सेना की भूमिका को लेकर चल रही बहस का हिस्सा है। समर्थकों का कहना है कि लोकतंत्र में सभी संस्थाओं को अपने संवैधानिक दायरे में रहकर काम करना चाहिए, जबकि आलोचकों का मानना है कि ऐसे बयान राजनीतिक ध्रुवीकरण को बढ़ा सकते हैं।