
यवतमाल एमआईडीसी (सौजन्य-सोशल मीडिया)
Vidarbha Industrial Report: 16 तहसील और 30 लाख से अधिक आबादी वाले यवतमाल जिले में पिछले 50 वर्षों से ‘एमआईडीसी’ का भूलभुलैया जारी है। चुनाव आते ही नेताओं की ओर से एमआईडीसी देने की घोषणाएँ होती हैं, बाद में कभी-कभार मंजूरी भी मिल जाती है। लेकिन दशकों बीत जाने पर भी उन एमआईडीसी में उद्योग शुरू नहीं होते।
नौकरी की उम्मीद में घूमते नौजवान नेता-मंडली के पीछे-पीछे घूमते-घूमते बूढ़े हो जाते हैं। अब फिर से चुनावी माहौल में एक नई एमआईडीसी का ऐलान हुआ है, लेकिन पहले से मंजूर एमआईडीसी के खाली भूखंडों पर कोई भी राजनीतिक दल कुछ बोलने को तैयार नहीं है। नगर परिषद चुनावों की आहट के बीच जिले में नेताओं की सभा-रैलियों का दौर तेज हो गया है।
पांढरकवड़ा नगर परिषद के प्रचार में एक नेता ने घोषणा की हम जीतकर आए तो यहां एमआईडीसी मंजूर कराएंगे। इतना ही नहीं, भाषण के दौरान ही उद्योग मंत्री से फोन पर ‘सकारात्मक जवाब’ भी मतदाताओं को सुनाया गया। लेकिन यह कोई पहली घोषणा नहीं है। इससे पहले भी यवतमाल, पुसद, नेर, आर्णी जैसे कई क्षेत्रों में एमआईडीसी का सपना दिखाया गया, कुछ जगहों पर मंजूरी भी मिली परंतु उद्योग नहीं आए।
बेरोजगार युवा आज भी पुणे-मुंबई का रुख करने को मजबूर हैं, जबकि गांव में लगे एमआईडीसी के विशाल बोर्ड धूप-बारिश में जंग खा रहे हैं। ऐसे में पांढरकवड़ा की नई घोषणा पर भी लोगों को भरोसा नहीं है। बेरोजगारों को रोजगार कब मिलेगा इसकी कोई गारंटी नहीं, मगर उद्योगपतियों को सस्ते भूखंड मिलने का रास्ता जरूर साफ होता दिख रहा है। यही वजह है कि एमआईडीसी का यह राजनीतिक खेल नौजवानों को ठगने का साधन बनता जा रहा है।
यवतमाल शहर की लोहारा-भोयर एमआईडीसी कई साल पहले बनी थी। मगर यहाँ जिन उद्योगपतियों को प्लॉट आवंटित हुए, उनमें से सिर्फ दो फीसदी ने ही उद्योग शुरू किए। कई भूखंडों पर स्कूल, संस्थाएँ या अन्य गैर-औद्योगिक काम चल रहे हैं। अधिकांश भूखंड वीरान पड़े हैं, जहाँ शराबियों और जुआरियों का जमावड़ा रहता है।
यवतमाल-अमरावती मार्ग पर स्थित नेर तहसील को भी वर्षों तक एमआईडीसी का लालच दिखाया गया। लंबे संघर्ष के बाद तीन साल पहले यहाँ एमआईडीसी मंजूर हुई, पर आज तक एक भी उद्योग शुरू नहीं हुआ। नेर के युवा गुज़रात तक रोज़गार की तलाश में भटक रहे हैं।
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शहर में बस एमआईडीसी का बोर्ड खड़ा है धरातल पर कुछ नहीं। यही स्थिति पुसद और उमरखेड की है, जहाँ के युवा पुणे-मुंबई में मजदूरी तक करने को विवश हैं। घाटंजी में तो लोगों को एमआईडीसी क्या होती है, यही पता नहीं। यहाँ रोजगार का गणित बस कुछ नेताओं की निजी स्कूलों में पैसे देकर नौकरी पाने तक सीमित है।
यवतमाल ही नहीं, बल्कि पूरे विदर्भ में एमआईडीसी की परिस्थिति चिंताजनक है। विदर्भ की एमआईडीसी में 1,246 युनिट बंद हैं, जबकि 3,906 आवंटित प्लॉट पर उद्योग शुरू ही नहीं हुए। इस मुद्दे पर नागपुर हाईकोर्ट खंडपीठ ने स्वतः संज्ञान लेकर जनहित याचिका भी दायर की है।
| जिला | कुल प्लॉट | आवंटित प्लॉट | चालू यूनिट | बंद यूनिट |
|---|---|---|---|---|
| अमरावती | 1,996 | 1,909 | 515 | 73 |
| अकोला | 2,608 | 2,312 | 1,210 | 93 |
| बुलढाणा | 1,046 | 937 | 450 | 135 |
| वाशिम | 306 | 208 | 32 | 11 |
| यवतमाल | 1,229 | 1,159 | 319 | 417 |
| नागपुर | 6,189 | 5,177 | 3,260 | 511 |
| भंडारा | 155 | 133 | 77 | 22 |
| गोंदिया | 421 | 331 | 144 | 52 |
| चंद्रपुर | 1,130 | 819 | 347 | 85 |
| वर्धा | 848 | 764 | 346 | 123 |
| गड़चिरोली | 238 | 202 | 45 | 36 |
| कुल | 16,166 | 14,031 | 6,745 | 1,246 |






