farmers hunger strike (सोर्सः सोशल मीडिया)
Yavatmal Farmers Hunger Strike: अडेगांव की धरती इन दिनों गुस्से से तप रही है। क्षेत्र में संचालित ईशान मिनरल्स कंपनी के खिलाफ ग्रामीणों ने निर्णायक जंग छेड़ दी है। प्रदूषण, गैरकानूनी उत्खनन और किसानों की बर्बाद होती फसलों से तंग आकर ग्रामीणों ने 10 फरवरी से आमरण अनशन शुरू कर दिया है। तीसरे दिन आंदोलन और उग्र हो गया, जब संजय खाडे आंदोलन स्थल पर पहुंचे और खुला समर्थन देते हुए प्रशासन को सीधी चेतावनी दी।
ग्रामीणों का आरोप है कि कंपनी की खदानों से उड़ने वाली जहरीली धूल ने खेतों को बंजर बना दिया है। हरी-भरी फसलें समय से पहले सूख रही हैं, उत्पादन आधा रह गया है और किसानों की वर्षों की मेहनत पर पानी फिर रहा है। कुछ किसानों को दिखावे के तौर पर मामूली मुआवजा दिया गया, लेकिन नवनाथ महादेव क्षीरसागर जैसे कई किसान पिछले 11–12 वर्षों से भरपाई के लिए भटक रहे हैं। क्षीरसागर का आरोप है कि उन्हें हर साल करीब 60 हजार रुपये का नुकसान हुआ है और अब तक 3 लाख 30 हजार रुपये का मुआवजा बकाया है।
इतना ही नहीं, ग्रामीणों ने कंपनी पर बफर जोन में भी खनन करने का गंभीर आरोप लगाया है। उनका कहना है कि पर्यावरणीय नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। खनन के बाद गहरे गड्ढों का पुनर्भरण नहीं किया गया, जिससे कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है। 80 फीट से अधिक डी-वॉटरिंग के कारण इलाके का जलस्तर तेजी से नीचे जा रहा है। कुएं और बोरवेल सूखने की कगार पर हैं, जिससे पेयजल संकट गहराता जा रहा है।
आंदोलनकारियों की मांग साफ है कि खनन कार्य तत्काल बंद किया जाए, बफर जोन में की गई खुदाई पर रोक लगे, खेतों को हुए नुकसान का पूरा मुआवजा दिया जाए और सड़कों पर नियमित पानी का छिड़काव कर धूल पर नियंत्रण किया जाए। ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासन सब कुछ जानते हुए भी आंखें मूंदे बैठा है, जिससे कंपनी के हौसले और बुलंद हो गए हैं।
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आंदोलन स्थल पर पहुंचे संजय खाडे ने कहा कि अडेगांव के किसानों के साथ अन्याय अब और नहीं चलेगा। यदि प्रशासन ने तुरंत कार्रवाई नहीं की तो कांग्रेस पार्टी सड़कों पर उतरकर बड़ा जनआंदोलन खड़ा करेगी। उनके साथ तेजराज बोढे, मोहन पानघाटे और नितेश ठाकरे समेत कई कार्यकर्ता मौजूद थे।
अडेगांव का यह आंदोलन अब केवल मुआवजे की लड़ाई नहीं रहा, बल्कि किसानों के अस्तित्व और पर्यावरण की रक्षा का सवाल बन चुका है। यदि प्रशासन ने जल्द सख्त कदम नहीं उठाए, तो यह जनाक्रोश किसी भी समय उग्र रूप ले सकता है, जिसकी जिम्मेदारी पूरी तरह प्रशासन पर होगी।