SC-ST एक्ट: वर्धा में 13 साल पुराने लंबित मामलों का निपटारा, 26 जनवरी तक नियुक्ति का लक्ष्य

SC ST victims Wardha: जिले में न्याय की नई किरण! SC ST अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत पीड़ित 25 परिवारों के वारिसों को सरकारी नौकरी का रास्ता साफ। प्रशासन का 26 जनवरी तक नियुक्तियां देने की तैयारी।
SC-ST Act: 13-year-old pending cases settled in Wardha, appointments targeted by January 26
प्रतीकात्मक तस्वीर ( सोर्स: सोशल मीडिया AI )
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Government Jobs For SC ST Victims Wardha:  महाराष्ट्र के वर्धा जिले में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत पीड़ितों को न्याय दिलाने की दिशा में प्रशासन ने एक बड़ा कदम उठाया है।

हत्या या अत्याचार के कारण मृत्यु का शिकार हुए परिवारों के एक पात्र वारिस को सरकारी या अर्ध-सरकारी नौकरी देने की प्रक्रिया तेज कर दी गई है।

समाज कल्याण विभाग के सहायक आयुक्त अंकेश केदार के अनुसार, जिले में लंबे समय से लंबित पड़े इन प्रस्तावों पर अब मुहर लगनी शुरू हो गई है, जिससे पीड़ित परिवारों को सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा मिल सकेगी।

वर्ष 2012 से 2025 तक के 25 प्रस्तावों को मंजूरी

वर्धा जिले में वर्ष 2012 से लेकर 2025 के बीच कुल 36 मामलों के प्रस्ताव प्राप्त हुए थे। जिला सतर्कता समिति ने इन आवेदनों की गहनता से समीक्षा की, जिसमें से 25 प्रस्तावों को पात्र पाया गया है। इन स्वीकृत प्रस्तावों को 24 दिसंबर 2025 को अंतिम मंजूरी के लिए समाज कल्याण आयुक्त के पास भेज दिया गया है। प्रशासन की मंशा है कि आगामी 26 जनवरी तक इन सभी पीड़ित परिवारों के पात्र सदस्यों के हाथों में नियुक्ति पत्र सौंप दिए जाएं, ताकि गणतंत्र दिवस के अवसर पर उन्हें वास्तविक न्याय मिल सके।

लंबित 11 प्रस्तावों की 6 जनवरी को होगी समीक्षा

प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि शेष 11 प्रस्तावों को अभी पूरी तरह खारिज नहीं किया गया है। वर्तमान में इन प्रस्तावों से संबंधित दस्तावेजों और कानूनी बारीकियों की जांच जारी है। सहायक आयुक्त अंकेश केदार ने जानकारी दी कि इन लंबित मामलों को आगामी 6 जनवरी को पुनः जिला सतर्कता समिति के समक्ष रखा जाएगा। यदि आवश्यक दस्तावेज और पात्रता की शर्तें पूरी पाई जाती हैं, तो इन प्रस्तावों को भी तुरंत अंतिम स्वीकृति के लिए आयुक्त कार्यालय भेज दिया जाएगा।

क्या कहता है कानून: समय सीमा और नियम

नियमों के अनुसार, अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज होने या आरोप पत्र दाखिल होने के 90 दिनों के भीतर पीड़ित परिवार को सहायता और नौकरी देना अनिवार्य है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस प्रक्रिया में न्यायालय के अंतिम निर्णय का इंतजार करना आवश्यक नहीं होता; कोर्ट का फैसला जो भी आए, पीड़ित परिवार को मिलने वाली नौकरी पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। प्रशासन अब इसी वैधानिक शक्ति का उपयोग कर पीड़ितों के घावों पर मरहम लगाने का प्रयास कर रहा है।

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