urban greenery loss (सोर्सः सोशल मीडिया)
Thane Tree Concretization Issue: मीरा-भाईंदर मनपा प्रशासन की विकास की अंधी दौड़ में शहर की हरियाली दम तोड़ती नजर आ रही है। सड़कों के चौड़ीकरण, गटर और पदपथ निर्माण के नाम पर पेड़ों की जड़ों तक कंक्रीट और डामर बिछा दिया गया है। नतीजा यह है कि जिन पेड़ों ने वर्षों तक शहर को छाया, स्वच्छ हवा और जीवन दिया, वही आज सांस लेने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
मनपा के कार्यों में बार-बार यह देखा गया है कि सड़क किनारे खड़े वृक्षों के चारों ओर डामर और कंक्रीट डाल दिया जाता है। इतना ही नहीं, पेड़ों में कीलें ठोककर बैनर और बिजली की लाइटें भी लगा दी जाती हैं। इन गतिविधियों के कारण पेड़ों की जड़ों तक न तो पर्याप्त पानी पहुंच पाता है और न ही हवा। परिणामस्वरूप, वृक्ष धीरे-धीरे कमजोर होकर सूखने लगते हैं।
फॉर फ्यूचर इंडिया के अध्यक्ष और पर्यावरण प्रेमी हर्षद ढगे का कहना है कि यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ क्रूरता है। क्योंकि पेड़ों से न वोट मिलते हैं और न वे विरोध दर्ज करा सकते हैं, इसलिए उनके अधिकारों की लगातार अनदेखी हो रही है। पेड़ों की जड़ों के आसपास कंक्रीट डालना उच्च न्यायालय और राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन है। विकास कार्य संविधान और पर्यावरणीय कानूनों की सीमाओं के भीतर रहकर किए जाने चाहिए।
सवाल यह उठता है कि जब नियम स्पष्ट हैं, तो मनपा के अधिकारी, संबंधित ठेकेदार और जनप्रतिनिधि इस पर अंकुश क्यों नहीं लगा पा रहे? क्या विकास के नाम पर पर्यावरण की बलि देना ही एकमात्र रास्ता रह गया है? पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने मांग की है कि जिम्मेदार अधिकारियों और ठेकेदारों पर मामला दर्ज किया जाए, दोषियों को निलंबित किया जाए और लापरवाह ठेकेदारों को ब्लैकलिस्ट किया जाए।
विशेषज्ञों का कहना है कि वृक्षों की जड़ों को खुला रखना बेहद आवश्यक है। इससे जड़ों को पर्याप्त ऑक्सीजन मिलती है, वर्षा का पानी जमीन में समाहित होता है, वृक्षों का प्राकृतिक विकास संभव होता है और शहर का तापमान नियंत्रित रहता है।
आज जब शहरों में तापमान लगातार बढ़ रहा है और प्रदूषण गंभीर समस्या बन चुका है, ऐसे में पेड़ों का संरक्षण केवल विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता है। मीरा-भाईंदर में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने की चुनौती सामने है। कंक्रीट की जीत यदि हरियाली की हार बन गई, तो इसका खामियाजा पूरे शहर को भुगतना पड़ेगा। अब देखना यह है कि प्रशासन अपने आदेशों को कितनी गंभीरता से लागू करता है और क्या शहर की हरियाली को समय रहते बचाया जा सकेगा। हरियाली की सांसें बचाना ही सच्चा विकास है।