Mira Bhayandar Mayor: भारी विरोध के बावजूद डिंपल मेहता चुनी गईं मीरा-भाईंदर की मेयर, बीजेपी ने दिखाई एकजुटता

Mira Bhayandar Mayor Dimple Mehta: मीरा-भाईंदर में भाषाई विवाद के बीच बीजेपी की डिंपल मेहता 79 वोटों के साथ मेयर चुनी गईं। मराठी एकीकरण समिति के विरोध को दरकिनार कर बीजेपी ने जीत दर्ज की।
Mira Bhayandar Mayor Dimple Mehta
Mira Bhayandar Mayor Dimple Mehta (फोटो क्रेडिट-इंस्टाग्राम)
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Dimple Mehta: महाराष्ट्र के मीरा-भाईंदर नगर निगम में पिछले कई दिनों से चल रहा 'मराठी बनाम अमराठी' महापौर का विवाद आखिरकार चुनाव परिणामों के साथ समाप्त हो गया। तमाम विरोध प्रदर्शनों और मराठी एकीकरण समिति की चेतावनियों को दरकिनार करते हुए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की उम्मीदवार डिंपल मेहता ने मेयर पद पर शानदार जीत हासिल की है। इस जीत के साथ ही मीरा-भाईंदर नगर निगम को इस कार्यकाल के लिए अपना पहला अमराठी महापौर मिल गया है। चुनाव प्रक्रिया के दौरान भाजपा ने पूरी तरह एकजुटता दिखाई, जिससे विपक्षी खेमे की रणनीति धरी की धरी रह गई।

महापौर चुनाव के लिए हुए मतदान में डिंपल मेहता को कुल 79 वोट मिले, जिसमें भाजपा के 78 नगरसेवक और एक निर्दलीय सदस्य का समर्थन शामिल था। वहीं, कांग्रेस और मीरा-भाईंदर विकास अघाड़ी की संयुक्त उम्मीदवार रुबीना शेख को मात्र 16 वोटों से संतोष करना पड़ा। उप-महापौर पद पर भी भाजपा का ही कब्जा रहा और ध्रुवकिशोर पाटील 79 मतों के साथ निर्वाचित घोषित किए गए। इस एकतरफा जीत ने नगर निगम में भाजपा के निर्विवाद वर्चस्व को एक बार फिर साबित कर दिया है।

मराठी एकीकरण समिति का विरोध और भाजपा का पलटवार

चुनाव के दौरान नगर निगम मुख्यालय के बाहर मराठी एकीकरण समिति और मनसे कार्यकर्ताओं ने जमकर नारेबाजी और प्रदर्शन किया। उनकी मुख्य मांग थी कि शहर का महापौर कोई मराठी भाषी ही होना चाहिए। हालांकि, भाजपा नेता प्रताप सरनाईक ने इस विरोध पर तीखा प्रहार किया है। सरनाईक ने सवाल उठाया कि ये समितियां चुनाव के समय कहाँ थीं? उन्होंने आरोप लगाया कि इन संगठनों ने चुनाव में विपक्षी दलों का साथ देकर भाजपा के उम्मीदवारों को नुकसान पहुँचाया। सरनाईक ने स्पष्ट किया कि शहर में 80 प्रतिशत आबादी अमराठी है, और योग्यता के आधार पर ही डिंपल मेहता का चयन किया गया है।

विपक्ष की करारी हार और ध्रुवीकरण की राजनीति

विपक्षी गठबंधन ने रुबीना शेख को मैदान में उतारकर भाजपा को चुनौती देने की कोशिश की थी, लेकिन वे बहुमत के आंकड़े के आसपास भी नहीं पहुँच सके। 16 मतों के साथ विपक्ष पूरी तरह अलग-थलग नजर आया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 'मराठी अस्मिता' के मुद्दे को हवा देने की कोशिशों के बावजूद, भाजपा ने अपने कैडर को एकजुट रखा। प्रताप सरनाईक ने यह भी याद दिलाया कि पूर्व में गीता जैन और नरेंद्र मेहता जैसे नेताओं के समय ऐसा विरोध क्यों नहीं हुआ, जिससे संकेत मिलता है कि विरोध के पीछे राजनीतिक प्रेरणा अधिक थी।

आगामी चुनौतियां और प्रशासनिक प्राथमिकताएं

डिंपल मेहता के मेयर बनने के बाद अब शहर के विकास कार्यों पर सबका ध्यान है। भाषाई विवाद के कारण पैदा हुए तनाव को कम करना और आगरी-कोली समुदाय के हितों की रक्षा करना उनके लिए बड़ी चुनौती होगी। नवनिर्वाचित मेयर ने संकेत दिया है कि उनकी प्राथमिकता बिना किसी भेदभाव के शहर का विकास और बुनियादी सुविधाओं में सुधार करना है। हालांकि, मराठी एकीकरण समिति ने चेतावनी दी है कि वे अपना आंदोलन जारी रखेंगे, जिससे आने वाले दिनों में नगर निगम के कामकाज में राजनीतिक गरमाहट बनी रहने के आसार हैं।

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