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विपक्ष ने खोला मोर्चा , बैकफुट पर सरकार, मीरा- भाईंदर की 254 एकड़ जमीन का मामला
- Written By: आंचल लोखंडे
Chandrashekhar Bawankule : मीरा-भाईंदर की 254।88 एकड़ सरकारी जमीन को लेकर महाराष्ट्र में बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी में है।

Mira Bhayandar Land (सोर्सः सोशल मीडिया)
Mira Bhayandar Land Dispute: मीरा- भाईंदर के करीब 6000 करोड़ रुपए मूल्य की 254।88 एकड़ जमीन को लेकर महाराष्ट्र में बड़ा कानूनी और राजनीतिक घमासान छिड़ गया है। विपक्ष के मोर्चा खोलते ही सरकार बैकफुट पर आ गई है। दरअसल बॉम्बे हाई कोर्ट द्वारा इस जमीन को प्राइवेट कंपनियों के पक्ष में मान्यता दिए जाने के बाद महाराष्ट्र सरकार अब सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने जा रही है।
राज्य सरकार ने इस मामले में स्पेशल लीव पिटीशन (एसएलपी) दाखिल करने का फैसला किया है। राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले ने साफ संदेश दिया है कि सरकारी जमीन पर कब्जा करने की किसी भी कोशिश को सफल नहीं होने दिया जाएगा। उन्होंने अधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट में मजबूती से सरकार का पक्ष रखने के निर्देश दिए हैं।
क्या है पूरा विवाद?
भाईंदर गांव स्थित इस 254।88 एकड़ जमीन को लेकर विवाद कई दशक पुराना है। महाराष्ट्र सरकार का दावा है कि यह जमीन पूरी तरह सरकारी स्वामित्व वाली है। आरोप है कि 1948 से रेवेन्यू रिकॉर्ड में बिना अनुमति बदलाव किए गए और पहले ‘एस्टेट इन्वेस्टमेंट कंपनी’ तथा बाद में ‘मीरा साल्ट वर्क्स’ का नाम कथित तौर पर गैर-कानूनी तरीके से दर्ज कर दिया गया।
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1958 में जमीन का उपयोग नमक उत्पादन के लिए शुरू हुआ, जिसके बाद केंद्र सरकार के साल्ट विभाग का नाम भी रिकॉर्ड में जोड़ा गया। मालिकाना हक को लेकर मामला अदालत पहुंचा और सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर ठाणे जिला कलेक्टर को अपील पर फैसला लेने को कहा गया था।
2002 में सरकार के पक्ष में आया था फैसला
वर्ष 2002 में ठाणे के तत्कालीन जिलाधिकारी ने मीरा साल्ट कंपनी का दावा खारिज कर दिया था और जमीन को सरकारी कब्जे में रखने का आदेश दिया था। इसके बाद 2019 में मीरा साल्ट वर्क्स और संबंधित कंपनियों के साथ केंद्र सरकार के नमक विभाग के आयुक्त ने बॉम्बे हाई कोर्ट में इस फैसले को चुनौती दी। 30 अप्रैल 2026 को बॉम्बे हाई कोर्ट ने आयुक्त की अपील खारिज करते हुए जमीन को ‘मीरा साल्ट वर्क्स’ की मान्यता दे दी। इसी फैसले के खिलाफ अब महाराष्ट्र सरकार सुप्रीम कोर्ट जाएगी।
सरकार ने फैसले पर क्यों जताई आपत्ति?
राज्य सरकार का कहना है कि हाई कोर्ट में मामला मुख्य रूप से अपील की ‘मेंटेनेबिलिटी’ यानी सुनवाई योग्य होने के मुद्दे पर था, लेकिन अदालत ने मेरिट के आधार पर फैसला सुना दिया। सरकार का मानना है कि इससे निजी डेवलपर्स को सरकारी जमीन पर दावा बनाए रखने का रास्ता मिल सकता है।
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6000 करोड़ की जमीन बिल्डरों के हवाले
बावनकुले ने महाराष्ट्र लैंड रेवेन्यू कोड 1966 के सेक्शन 29(3)(अ) का हवाला देते हुए कहा कि यह जमीन स्पष्ट रूप से सरकारी श्रेणी में आती है। उन्होंने कहा कि सीमित अधिकारों के तहत जमीन उपयोग करने वालों को मालिक नहीं माना जा सकता।बावनकुले ने कहा कि रेवेन्यू रिकॉर्ड में फेरबदल कर सरकारी जमीन हड़पने की कोशिशों को किसी भी कीमत पर सफल नहीं होने दिया जाएगा। सरकार सुप्रीम कोर्ट में पूरी ताकत से लड़ाई लड़ेगी।
वडेट्टीवार ने सरकार पर उठाए सवाल
वहीं कांग्रेस नेता विजय वडेट्टीवार ने इस पूरे मामले में राज्य सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि करोड़ों रुपये मूल्य की सरकारी जमीन को निजी डेवलपर्स के पक्ष में जाने देने के लिए प्रशासनिक स्तर पर जानबूझकर देरी की गई।
वडेट्टीवार ने आरोप लगाया कि जिलाधिकारी द्वारा जमीन सरकार के नाम दर्ज करने के आदेश के बावजूद मामले की उच्च स्तर पर प्रभावी जांच नहीं हुई। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान सरकारी पक्ष मजबूती से अपना पक्ष क्यों नहीं रख सका। उन्होंने कहा कि 30 अप्रैल 2026 का हाई कोर्ट फैसला सरकारी कानूनी तंत्र की बड़ी विफलता को दर्शाता है।
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