Maharashtra free treatment scheme (सोर्सः सोशल मीडिया)
Temba Hospital Mira Bhayander: राज्य में गरीब और जरूरतमंद मरीजों के लिए बड़ी राहत मानी जा रही “पूरी तरह से मुफ्त इलाज” योजना अब खत्म होती नजर आ रही है। करीब ढाई साल पहले बड़े उत्साह के साथ शुरू की गई इस योजना पर राज्य सरकार ने यू-टर्न लेते हुए सरकारी अस्पतालों में दोबारा शुल्क वसूलने का निर्णय लिया है।
हाल ही में जारी सरकारी निर्णय (जीआर) के अनुसार, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर जिला और महिला अस्पतालों तक नई शुल्क दरें लागू कर दी गई हैं। राज्य सरकार के इस फैसले के बाद मीरा-भाईंदर के एकमात्र सरकारी भारत रत्न पंडित भीमसेन जोशी (टेंबा) अस्पताल में इलाज के लिए आने वाले मरीजों को अब शुल्क देकर उपचार कराना होगा।
तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री तानाजी सावंत ने 15 अगस्त 2023 को राज्य के सभी सरकारी अस्पतालों में पूरी तरह मुफ्त इलाज की घोषणा की थी। इसके तहत छोटी प्रक्रियाओं से लेकर रक्त परीक्षण, एक्स-रे, सीटी स्कैन और सर्जरी तक हर तरह की चिकित्सा सेवा नि:शुल्क उपलब्ध कराई जा रही थी। हालांकि, अब स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि यह योजना आर्थिक और प्रशासनिक दृष्टि से व्यावहारिक नहीं रही, जिसके चलते इलाज पर दोबारा शुल्क लगाने का फैसला लिया गया है।
सरकारी अस्पतालों में इलाज अब पूरी तरह मुफ्त नहीं होगा। नई दरों के अनुसार:
जांच और स्कैन
सीटी स्कैन
सर्जरी और उपचार
प्रसूति सेवाएं
ये भी पढ़े: संभाजीनगर में सनसनी, नाबालिग को शादी का झांसा, यौन शोषण का खुलासा; आरोपी गिरफ्तार
अन्य सेवाएं
राज्य सरकार के इस फैसले पर नाराज़गी भी जताई जा रही है। पूर्व नगरसेवक व स्वास्थ्य कार्यकर्ता ओमप्रकाश गाड़ोदिया का कहना है कि कागज़ों पर ये शुल्क कम लग सकते हैं, लेकिन सरकारी अस्पतालों में आने वाले अधिकांश मरीज समाज के कमजोर और गरीब वर्ग से होते हैं। ऐसे में मुफ्त इलाज की सुविधा जारी रहनी चाहिए। उन्होंने सरकार से इस फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग की है।
सरकार ने स्पष्ट किया है कि कुछ श्रेणियों को पहले की तरह निःशुल्क उपचार का लाभ मिलता रहेगा। इनमें सरकारी कर्मचारी और उनके परिवार, सरकारी अस्पतालों में कार्यरत डॉक्टर व नर्सें, मेडिकल, नर्सिंग, फिजियोथेरेपी और व्यावसायिक पाठ्यक्रमों के छात्र, न्यायिक हिरासत में रखे गए व्यक्ति, स्वतंत्रता सेनानी और उनके परिवार, मेडिकल-फोरेंसिक मामलों के मरीज, पुलिस द्वारा भेजे गए मरीज, कुष्ठ रोग बोर्ड द्वारा संदर्भित मरीज, आश्रम विद्यालय और महिला सुधारगृहों से भेजे गए मरीज, शहरी क्षेत्रों के निर्धन बच्चे, विधायक, सांसद और न्यायाधीश आदि शामिल हैं।
मुफ्त इलाज से शुल्क व्यवस्था की ओर लौटने के इस फैसले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सरकारी अस्पताल वास्तव में आम और गरीब मरीजों के लिए सुलभ रह पाएंगे। आने वाले दिनों में इस निर्णय को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर बहस तेज होने की संभावना है।
(इनपुट: विनोद मिश्रा)