
केंद्रीय राज्यमंत्री मुरलीधर मोहोल (सोर्स: सोशल मीडिया)
Murlidhar Mohol Statement: पुणे नगर निकाय चुनाव के नजदीक आते ही राजनीतिक सरगर्मी चरम पर है। केंद्रीय राज्यमंत्री मुरलीधर मोहोल ने स्वारगेट मेट्रो में यात्रा के दौरान शहर के राजनीतिक माहौल पर अपनी राय रखी। उन्होंने विश्वास जताया कि पुणे की समझदार जनता विकास कार्यों को देखते हुए एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी को ही चुनेगी।
हाल ही में शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे ने अपनी सेना को असली बताते हुए विपक्ष पर ‘शाहसेना’ कहकर तंज कसा था। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए केंद्रीय राज्यमंत्री मुरलीधर मोहोल ने कहा कि उद्धव ठाकरे को इस मुद्दे को बहुत अधिक गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि राजनीति में इस तरह की बयानबाजी के बजाय वास्तविक मुद्दों और जनता के हितों पर ध्यान देना अधिक आवश्यक है। गुरुवार को जब मोहोल स्वारगेट मेट्रो से सफर कर रहे थे, तब उन्होंने विपक्ष के तीखे हमलों का जवाब देते हुए अपना आत्मविश्वास प्रदर्शित किया।
निकाय चुनाव में अब केवल अंतिम 8 दिन बचे हैं और शहर का सियासी पारा लगातार बढ़ रहा है। मोहोल ने पुणे के वर्तमान माहौल का विश्लेषण करते हुए कहा कि यह बिल्कुल स्पष्ट है कि पुणेकर एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी पर ही अपना भरोसा जताने जा रहे हैं। उनके अनुसार, पुणे की जनता अत्यंत जागरूक है और उसे यह अच्छी तरह पता है कि किसने शहर के लिए धरातल पर काम किया है और किसने केवल वादे किए हैं।
मुरलीधर मोहोल ने मतदाताओं के अनुभव को जीत का मुख्य आधार बताया। उन्होंने कहा कि कोरोना महामारी के कठिन समय में पुणे की जनता ने सब कुछ अपनी आंखों से देखा है। जनता जानती है कि संकट की उस घड़ी में किसने जिम्मेदारी निभाई और किसने लोगों की मदद के लिए सक्रिय रूप से काम किया। मोहोल का मानना है कि उस दौरान किए गए कार्यों का अनुभव ही आने वाले चुनाव में लोगों के फैसले का मुख्य कारण बनेगा।
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अपने संबोधन के अंत में मोहोल ने बड़े आत्मविश्वास के साथ दावा किया कि चुनाव परिणामों के बाद पुणे का अगला मेयर फिर से भारतीय जनता पार्टी का ही बनेगा। जैसे-जैसे मतदान का समय पास आ रहा है, राजनीतिक दलों के बीच जुबानी जंग तेज होती जा रही है। अब शहर की सत्ता की चाबी किसके हाथ में होगी और जनता किसे अपना समर्थन देगी, यह आने वाले कुछ दिनों में स्पष्ट हो जाएगा।
चुनाव एक वार्षिक परीक्षा की तरह है, जहाँ नेता साल भर के अपने ‘काम का पर्चा’ भरते हैं और जनता, एक निष्पक्ष शिक्षक की तरह, केवल ईमानदारी और प्रदर्शन के आधार पर ही अंतिम परिणाम घोषित करती है।






