नासिक मनपा चुनाव: 55% उम्मीदवारों ने खुद को बताया किसान, गंगापुर रोड पर खेत नहीं; फिर भी किसान?

Farming as Profession: नासिक मनपा चुनाव के हलफनामों में 55% उम्मीदवारों ने खेती को मुख्य पेशा बताया है, जबकि शहर में कृषि भूमि लगातार सिमट रही है। यह दावा अब चुनावी बहस का विषय बन गया है।
Nashik Municipal Corporation elections: 55% of candidates declared themselves farmers, but there are no farms on Gangapur Road; so are they really farmers?
प्रतीकात्मक तस्वीर ( सोर्स: सोशल मीडिया AI )
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Nashik Municipal Election: नासिक महानगरपालिका चुनाव में उतरे उम्मीदवारों के हलफनामों (एफिडेविट) ने एक हैरान करने वाली तस्वीर पेश की है। शहर में तेजी से बढ़ते कंक्रीट के जंगल और सिमटती कृषि भूमि के बावजूद, करीब 55 प्रतिशत उम्मीदवारों ने 'खेती' को अपना मुख्य प्रोफेशन और आय का जरिया बताया है। चुनाव शाखा में जमा किए गए दस्तावेजों को देखने पर पता चलता है कि शहरी जीवन जीने वाले अधिकांश दिग्गज नेताओं का दिल आज भी अपनी खेती की जमीन के लिए धड़कता है। सिमटते खेत और बढ़ते दावे मनपा सीमा क्षेत्र में पहले बड़े पैमाने पर खेती होती थी, लेकिन पिछले दो दशकों में रेजिडेंशियल और कमर्शियल प्रोजेक्ट्स के कारण कृषि क्षेत्र काफी कम हो गया है। वर्तमान में नासिक की बाहरी सीमाओं, विशेष रूप से मखमलाबाद, नांदूर, नासिक रोड और सातपुर के कुछ हिस्सों में ही खेती बची है। गंगापुर रोड जैसे पॉश इलाकों में तो अब खेती का क्षेत्रफल न के बराबर रह गया है। इसके बावजूद, चुनाव लड़ रहे आधे से ज्यादा उम्मीदवारों ने खुद को किसान बताया है, जो चर्चा का विषय बना हुआ है।

पढ़े-लिखे चेहरों और महिलाओं की भागीदारी

इस बार के चुनाव में पहली बार किस्मत आजमा रहे युवाओं में उच्च शिक्षा का अनुपात काफी अधिक है। हलफनामों के वेरिफिकेशन से पता चला है कि किसान परिवारों की कई महिलाएं भी मैदान में हैं। हालांकि, इनमें से अधिकांश ने खुद को 'हाउसवाइफ' (गृहणी) के तौर पर रजिस्टर कराया है, कुछ महिला उम्मीदवारों ने स्वरोजगार और जॉब, दोनों का जिक्र अपने शपथपत्र में किया है।

रियल एस्टेट का छिपा हुआ 'बिजनेस'

हालांकि कागजों पर खेती और छोटे व्यापार दिखाने वाले उम्मीदवारों की संख्या अधिक है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। शहर के ज्यादातर वर्तमान और भावी कॉर्पोरेटर प्लॉटिंग, फ्लैट स्कीम और जमीन की खरीद-फरोख्त (रियल एस्टेट) के बड़े कारोबार से जुड़े हैं। इनमें से कुछ उम्मीदवारों का यह बिजनेस तो पूरे महाराष्ट्र में फैला हुआ है, लेकिन चुनावी हलफनामों में इसका विस्तृत जिक्र बहुत कम जगहों पर देखने को मिला है।

इनकम टैक्स से बचने का 'हथियार' तो नहीं खेती ?

राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी जोरों पर है कि आखिर शहरी उम्मीदवार खुद को किसान क्यों दिखा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि कृषि आय पर मिलने वाली टैक्स छूट और ग्रामीण पृष्ठभूमि वाले मतदाताओं से जुड़ाव महसूस कराना इसके पीछे की मुख्य वजह हो सकती है। 'एग्री' कार्ड खेलकर उम्मीदवार खुद को जमीन से जुड़ा हुआ दिखाने की कोशिश कर रहे हैं, भले ही उनकी आलीशान कोठियों के आसपास दूर-दूर तक कोई खेत न हो।

इन वाडों में सबसे अधिक 'किसान' उम्मीदवार

  • आंकड़ों के विश्लेषण से यह साफ हुआ है कि सबसे ज्यादा किसान उम्मीदवार वार्ड संख्या 1, 5, 8, 10 और 17 में सक्रिय है।
  • इसके विपरीत, वार्ड 2, 6, 11, 14 और 23 में प्रोफेशनल बिजनेस, इंडस्ट्री और होम इंडस्ट्री से जुड़े उम्मीदवारों का अनुपात अधिक है।
  • एक ओर उम्मीदवारों ने खुद को किसान बताया है, जिसकी आय अक्सर मौसम पर निर्भर होती है, वहीं दूसरी ओर उनके चुनावी प्रचार में करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए जा रहे हैं।
  • हलफनामों में घोषित चल-अचल संपत्ति और वास्तविक चुनावी खर्च के बीच का यह विरोधाभास प्रशासन के लिए भी जांच का विषय बना हुआ है।
  • कई किसान' उम्मीदवारों के पास महंगी गाड़ियां और शहर के प्राइम लोकेशन पर कमर्शियल प्रॉपर्टीज भी है।
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