नागपुर विस्फोटक कंपनी धमाका, 17 की मौत, बोइसर से डोंबिवली तक महाराष्ट्र के 'डेथ जोन' बने MIDC कारखाने

Nagpur Explosion News: नागपुर के राउलगांव में विस्फोटक कंपनी में धमाके से 17 की मौत। जानें पालघर, बोइसर और डोंबिवली MIDC में हुए अब तक के सबसे भीषण औद्योगिक हादसों का पूरा सच।
Nagpur SBL Company Blast
Nagpur SBL Company Blast (डिजाइन फोटो)
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Nagpur SBL Company Blast: महाराष्ट्र के नागपुर जिले के कटोल तालुका स्थित राउलगांव में एक विस्फोटक बनाने वाली कंपनी में भीषण धमाके ने पूरे राज्य को दहला दिया है। रविवार की सुबह हुए इस विस्फोट की तीव्रता इतनी अधिक थी कि कारखाने का एक बड़ा हिस्सा जमींदोज हो गया और आसपास के कई किलोमीटर के दायरे में भूकंप जैसे झटके महसूस किए गए। इस हृदयविदारक घटना में अब तक 17 श्रमिकों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि कई लोग गंभीर रूप से झुलस गए हैं, जिनका उपचार स्थानीय अस्पतालों में जारी है।

प्रशासनिक और दमकल विभाग की टीमें मौके पर राहत और बचाव कार्य में जुटी हैं। मलबे के नीचे अभी भी कुछ लोगों के दबे होने की आशंका जताई जा रही है। मुख्यमंत्री ने इस घटना पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए उच्च स्तरीय जांच के आदेश दिए हैं। हालांकि, यह पहली बार नहीं है जब महाराष्ट्र के औद्योगिक क्षेत्रों (MIDC) में सुरक्षा मानकों की अनदेखी के कारण निर्दोष मजदूरों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। पालघर के बोइसर से लेकर डोंबिवली तक, राज्य के विभिन्न हिस्सों में बार-बार होने वाले ये हादसे औद्योगिक सुरक्षा पर बड़े सवाल खड़े करते हैं।

पालघर और बोइसर: केमिकल कंपनियों का 'डेथ बेल्ट'

पालघर जिले का बोइसर एमआईडीसी (Tarapur MIDC) क्षेत्र लंबे समय से रासायनिक विस्फोटों का केंद्र रहा है। यहाँ की केमिकल कंपनियों में बॉयलर फटने की घटनाएं आम हो चुकी हैं। साल 2018 में 'नोवा आर्यन' नामक कंपनी में हुए धमाके में 3 लोगों की जान गई थी, वहीं 2020 में एक अन्य बड़े धमाके में 8 श्रमिकों की दर्दनाक मौत हुई थी। इसके बाद 2022 में भी तारापुर एमआईडीसी की एक कंपनी में रिएक्टर फटने से भयंकर आग लगी थी। इन घटनाओं के पीछे अक्सर यह पाया गया कि कंपनियां अपनी क्षमता से अधिक रसायनों का भंडारण करती हैं और दबाव नियंत्रण प्रणालियों (Pressure Relief Systems) की समय पर जांच नहीं की जाती।

डोंबिवली और तलोजा: रिहायशी इलाकों के करीब 'टाइम बम'

ठाणे जिले के डोंबिवली एमआईडीसी में साल 2016 में हुआ 'प्रोबेस' (Probase) कंपनी का धमाका महाराष्ट्र के इतिहास के सबसे बड़े औद्योगिक हादसों में से एक माना जाता है। इस विस्फोट में 12 लोगों की मौत हुई थी और इसकी धमक 5 किलोमीटर दूर तक महसूस की गई थी, जिससे आसपास की इमारतों की खिड़कियां तक टूट गई थीं। इसी तरह नवी मुंबई के तलोजा और रायगढ़ के महाड एमआईडीसी में भी बॉयलर फटने और गैस रिसाव की सैकड़ों घटनाएं दर्ज हैं। इन क्षेत्रों में फैक्ट्रियों का रिहायशी इलाकों के बेहद करीब होना सबसे बड़ा खतरा बना हुआ है, जिससे न केवल श्रमिक बल्कि आम नागरिक भी हमेशा जोखिम में रहते हैं।

हादसों के बाद सरकारी कार्रवाई और सुरक्षा ऑडिट की हकीकत

हर बड़े हादसे के बाद राज्य का औद्योगिक सुरक्षा एवं स्वास्थ्य निदेशालय (DISH) सक्रिय होता है। कंपनियों पर जुर्माने लगाए जाते हैं और कुछ को 'क्लोजर नोटिस' भी जारी किए जाते हैं। नागपुर और पालघर जैसे हादसों के बाद सरकार अक्सर मृतक आश्रितों को 5-5 लाख रुपये के मुआवजे का ऐलान करती है। हालांकि, विशेषज्ञों का आरोप है कि भ्रष्टाचार के कारण सुरक्षा ऑडिट केवल कागजों तक सीमित रहता है। औद्योगिक सुरक्षा नियमों के तहत हर 6 महीने में बॉयलर और प्रेशर वेसल्स का अनिवार्य निरीक्षण होना चाहिए, लेकिन कई कंपनियां निजी निरीक्षकों से 'फिटनेस सर्टिफिकेट' बनवाकर नियमों की धज्जियां उड़ाती हैं। जब तक सख्त कानूनी सजा और डिजिटल मॉनिटरिंग सिस्टम लागू नहीं होगा, तब तक ये फैक्ट्रियां 'मौत के कारखाने' बनी रहेंगी।

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