हजारों छात्रों का सवाल: नागपुर में रीजनल पैरामेडिकल इंस्टीट्यूट कब बनेगा? फाइलों में अटका बड़ा प्रोजेक्ट

Nagpur Paramedical Institute: नागपुर में रीजनल पैरामेडिकल इंस्टीट्यूट का सपना 16 वर्षों से अधूरा है। विशेषज्ञों का मानना है कि संस्थान बनने से शिक्षा, मान्यता और रोजगार को नई दिशा मिलेगी।
Question of thousands of students: When will the Regional Paramedical Institute be built in Nagpur? Big project stuck in files
पैरामेडिकल इंस्टीट्यूट, जीएमसी नागपुर, स्वास्थ्य शिक्षा,(सोर्स: सोशल मीडिया)
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Nagpur Health Education: नागपुर जिले में कुछ वर्ष पहले सरकार ने शासकीय वैद्यकीय महाविद्यालय व अस्पताल में रीजनल पैरामेडिकल इंस्टीट्यूट बनाने की घोषणा की थी। इंस्टीट्यूट की दिशा में काम भी शुरू हुआ लेकिन बाद में मामला फाइलों में अटक गया। इसके पश्चात राज्य सरकार ने सभी सरकारी मेडिकल कॉलेजों में बैचरल इन पैरामेडिकल टेक्नोलॉजी पाठ्यक्रम शुरू किये लेकिन साधन-सुविधाओं की कमी के चलते प्रवेश की गति धीमी रही।

पिछले 16 वर्षों से पैरामेडिकल को अपने इंस्टीट्यूट का इंतजार है। एक ओर जहां तमाम तरह के प्रोजेक्ट जारी हैं वहीं केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी चाहें तो नागपुर में पैरामेडिकल इंस्टीट्यूट का भी सपना साकार हो सकता है। इंस्टीट्यूट नहीं बनने से राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता भी नहीं मिल रही है। सरकार ने सरकारी मेडिकल कॉलेजों में 2010 से पैरामेडिकल पाठ्यक्रम शुरू किए। शुरुआत 18 मेडिकल कॉलेजों से हुई थी जो अब राज्यभर के लगभग 25 से अधिक कॉलेजों में संचालित हो रहे हैं।

देश की स्वास्थ्य व्यवस्था में डॉक्टरों और नसों की भूमिका जितनी महत्वपूर्ण है, उतनी ही एलाइड हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स की भी है। रेडियोलॉजी, मेडिकल लैबोरेटरी, ऑपरेशन थिएटर, ब्लड बैंक, कार्डियक, केयर, रेस्पिरेटरी थेरेपी, आपातकालीन चिकित्सा, फोरेंसिक मेडिसिन, कम्युनिटी मेडिसिन और अनेक तकनीकी क्षेत्रों में कार्यरत यही पेशेवर आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं की वास्तविक रीढ़ हैं।

महाराष्ट्र स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय के अंतर्गत एलाइड हेल्थ एवं पैरामेडिकल डिग्री पाठ्यक्रमों को प्रारंभ हुए लगभग 16 वर्ष से अधिक समय बीत चुका है। अब तक हजारों विद्यार्थी स्नातक होकर निकले हैं। इसके बावजूद आज भी यह क्षेत्र उच्च शिक्षा, नियामक कार्यान्वयन, अकादमिक विकास और रोजगार संरचना के मामले में गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है।

अब तक शुरू नहीं हो सके पीजी पाठ्यक्रम

किसी भी शैक्षणिक क्षेत्र की प्रगति का आधार केवल स्नातक शिक्षा नहीं बल्कि स्नातकोतर शिक्षा, शोध और अध्यापन व्यवस्था होती है। दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि महाराष्ट्र में अधिकांश एलाइड हेल्थ साइंस शाखाओं के लिए आज भी नियमित स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम उपलब्ध नहीं है। रेडियोलॉजी, ऑपरेशन थिएटर टेक्नोलॉजी, मेडिकल लैबोरेटरी टेक्नोलॉजी, कम्युनिटी मेडिसिन, फोरेंसिक मेडिसिन एवं टॉक्सिकोलॉजी, कार्डियक केयर, रेस्पिरेटरी थेरेपी, ब्लड बैंक टेक्नोलॉजी तथा अन्य कई शाखाओं में हजारों विद्यार्थी स्नातक हो चुके हैं लेकिन उनके लिए उच्च शिक्षा का कोई व्यवस्थित मार्ग उपलब्ध नहीं है।

यह होता है परिणाम

  • विद्यार्थियों की शैक्षणिक प्रगति रुक जाती है।
  • शोध और नवाचार की संभावनाएं सीमित हो जाती है।
  • विशेषज्ञ शिक्षक और प्राध्यापक तैयार नहीं हो पाते।
  • विद्यार्थियों को अन्य राज्यों या अन्य क्षेत्रों में जाना पड़ता है।
  • अनेक प्रशिक्षित पेशेवर अपने ही क्षेत्र को छोड़ने पर मजबूर होते हैं।

महाराष्ट्र को एलाइड हेल्थकेयर क्षेत्र में और अधिक अल्पकालीन पाठ्यक्रमों की नहीं बल्कि उच्च शिक्षा, शोध, मानकीकृत प्रशिक्षण और पेशेवर विकास की दीर्घकालिक नीति की आवश्यकता है। आने वाले समय की स्वास्थ्य व्यवस्था केवल डॉक्टरों और अस्पतालों पर नहीं बल्कि कुशल एवं प्रशिक्षित एलाइड हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स पर भी निर्भर करेगी.

-अध्यक्ष, एसीसिएशन ऑफ एलाइड हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स, राजेश उके

नागपुर में प्रस्तावित इंस्टीटयूट को लेकर एक बार फिर प्रयास किये जाने की जरूरत है। इंस्टीट्यूट बनेगा तो पृथक व्यवस्था विकसित होगी। वैसे भी मेडिकल कॉलेज अब स्वायत्ता होने जा रहा है। इस हालत में पैरामेडिकल को भी पृथक किया जान चाहिए। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी द्वारा गंभीरता से ध्यान दिया गया तो यह संभव है।

- उपाध्यक्ष, शुभम कवटकर

संस्थाएं अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा रहीं

महाराष्ट्र स्टेट एलाइड एंड हेल्थकेयर काउंसिल, महाराष्ट्र पैरामेडिकल काउंसिल तथा चिकित्सा शिक्षा विभाग से यह अपेक्षा थी कि वे राष्ट्रीय आयोग के निर्णयों और मानकों को राज्य की सभी संबंधित संस्थाओं तक प्रभावी रूप से पहुंचाएं। हालांकि इस क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या शिक्षा और नियमन है, फिर भी रोजगार से जुड़े कुछ प्रश्न भी गंभीर हैं। कई विशिष्ट एलाइड हेल्थ पाठ्यक्रमों के लिए आज तक स्पष्ट भर्ती नियम विकसित नहीं किए गए हैं। दूसरी ओर अनेक तकनीकी सेवाएं नियमित नियुक्तियों के बजाय आउटसोर्सिंग के माध्यम से संचालित की जा रही हैं। विशेष रूप से फोरेंसिक मेडिसिन, कम्युनिटी मेडिसिन तथा अन्य विशेषज्ञ क्षेत्रों के स्नातकों का कहना है कि उनके लिए बनाए गए पाठ्यक्रमों के अनुरूप पद और करियर मार्ग अब तक स्पष्ट नहीं किए गए हैं।

प्रयोगशाला, शिक्षकों की कमी

जब अन्य सभी स्वास्थ्य शाखाओं में मास्टर्स, पीएचडी और अकादमिक करियर की व्यवस्था उपलब्ध है तब एलाइड हेल्थकेयर क्षेत्र को इस अवसर से वंचित रखना एक गंभीर नीतिगत असंतुलन माना जा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले डेढ़ दशक में पाठ्यक्रम तो बढ़े लेकिन उनके अनुरूप शैक्षणिक ढांचा विकसित नहीं हो सका। आज भी अनेक संस्थानों में विशेषज्ञ शिक्षकों की कमी है। स्वतंत्र अकादमिक विभागों का अभाव है।

शोध सुविधाएं सीमित है। आधुनिक प्रयोगशालाओं का विकास अपेक्षित स्तर तक नहीं हुआ है। विद्यार्थियों के लिए शैक्षणिक एवं प्रशिक्षण संसाधन अपर्याप्त हैं।

यदि किसी स्वास्थ्य क्षेत्र को मजबूत बनाना है तो केवल पाठ्यक्रम शुरू करना पर्याप्त नहीं होता सके लिए उच्च शिक्षा, शोध, शिक्षण और करियर विकास की पूरी श्रृंखला विकसित करनी पड़ती है।

राज्य स्तर पर कमजोर क्रियान्वयन

वर्ष 2021 में केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय एलाइड एवं हेल्थकेयर प्रोफेशन्स अधिनियम लागू किया, जिसका उद्देश्य पूरे देश में एलाइड हेल्थकेयर शिक्षा और पेशेवर मानकों को एकरूप बनाना था। इसके बाद राष्ट्रीय एलाइड एवं हेल्थकेयर प्रोफेशन्स आयोग ने विभिन्न व्यवसायों के लिए मानकीकृत पाठ्यक्रम तैयार किए और 2025 में स्पष्ट निर्देश जारी किए कि शैक्षणिक सत्र 2026-27 से इन पाठ्यक्रमों को अनिवार्य रूप से लागू किया जाए।

12वीं विज्ञान के बाद न्यूनतम 4 वर्षीय डिग्री कार्यक्रम (3 वर्ष अध्ययन + 1 वर्ष इंटर्नशिप) होने चाहिए। स्नातकोत्तर शिक्षा के लिए मास्टर्स या न्यूनतम 2 वर्षीय पीजी डिप्लोमा कार्यक्रम होने चाहिए। पर्याप्त क्लिनिकल प्रशिक्षण, कौशल विकास और व्यावसायिक दक्षता सुनिश्चित की जानी चाहिए।

-नवभारत लाइव के लिए नागपुर से दिनेश टेकाड़े की रिपोर्ट

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