नागपुर में 'सफेद हाथी' बने करोड़ों के ऑक्सीजन प्लांट, मेडिकल और यूनिवर्सिटी में धूल खा रही मशीनें

Nagpur University Covid Hospital Oxygen Panel: कोविड काल में स्थापित नागपुर के ऑक्सीजन प्लांट अब निरुपयोगी हैं। मेडिकल और यूनिवर्सिटी परिसर में मेंटेनेंस न होने से मशीनें खराब हो रही हैं।
Defunct oxygen plants in Nagpur Medical College Nagpur University Covid hospital oxygen panel
ऑक्सीजन सिलेंडर (सौजन्य-नवभारत)
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Defunct oxygen plants in Nagpur: कोविड महामारी के दौरान ऑक्सीजन की कमी गंभीर समस्या बनी हुई थी। लोगों को सिलेंडर नहीं मिल रहे थे। उस वक्त सरकारी सहित प्राइवेट अस्पतालों में कभी ऑक्सीजन प्लांट की जरूरत ही नहीं पड़ी थी। मरीजों की बढ़ती संख्या के बाद ऑक्सीजन प्लांट लगाने की शुरुआत की गई। इसके तहत मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में 3 अतिरिक्त प्लांट लगाए गए।

वहीं नागपुर यूनिवर्सिटी के अंबाझरी रोड स्थित प्रशासकीय भवन सहित एम्स और कुछ प्राइवेट अस्पतालों में भी ऑक्सीजन प्लांट लगाए गए लेकिन जब तक ऑक्सीजन प्लांट लगाए गए तब तक कोविड की लहर कमजोर पड़ने लगी और ऑक्सीजन की आपूर्ति भी कम होने लगी। यही वजह है कि इन ऑक्सीजन प्लांट की जरूरत ही नहीं पड़ी।

यानी तब से लेकर उक्त ऑक्सीजन प्लांट ‘सफेद हाथी’ बने हुए हैं। वर्तमान में उनका नियमित मेंटनेंस भी नहीं हो रहा है। कोविड के दौरान मेडिकल में मार्ड हॉस्टल के पीछे, ट्रामा के पीछे ऑक्सीजन प्लांट लगाये गये थे।

इससे पहले मेडिकल में पेइंग वार्ड के पास लगाये गये लिक्विड प्लांट से 2000 बेड की जरूरत पूरी हो रही थी लेकिन महामारी की दहशत के बाद 3 अतिरिक्त प्लांट लगाये गये। हवा से ऑक्सीजन बनाने वाले इन प्लांट की क्षमता 500 किलो वॉट है लेकिन इनका उपयोग नहीं हुआ। तब से यह प्लांट निरुपयोगी पड़े हैं यानी लाखों रुपये खर्च कर लगाये गये प्लांट फिलहाल जगह घेरे खड़े हैं।

यूनिवर्सिटी में अब भी लगे पैनल

इसी तरह नागपुर यूनिवर्सिटी की नई प्रशासकीय इमारत के पहली मंजिल पर कोविड हॉस्पिटल बनाया गया था। बेड लगाये गये और सभी बेड पर ऑक्सीजन लाइन भी लगाई गई। नीचे प्लांट लगाया गया। लेकिन यहां भी कभी मरीजों को भर्ती करने की नौबत नहीं आई। आज भी कमरों में ऑक्सीजन पैनल लगे हुए हैं। वहीं प्लांट भी धूल खा रहा है।

जरूरत नहीं पड़ने की वजह से अब तो उनका मेंटनेस भी नहीं किया जाता। एक तरह से यह प्लांट बिना उपयोग के पड़े हुए हैं। इस संबंध में मनपा द्वारा अब तक कोई भी कार्यवाही नहीं की गई है। बताया जाता है कि शासकीय संस्थाओं में सरकारी विभागों द्वारा सामाजिक दायित्व (सीएसआर) के निधि खर्च कर प्लांट लगाए गए थे।

सभी प्लांट में हवा से ऑक्सीजन बनाई जानी थी। शुरुआत में प्रक्रिया भी हुई लेकिन बाद में जरूरत कम होने से ऑक्सीजन उत्पादन भी बंद कर दिया गया। इन प्लांट में ऑक्सीजन भी कम गुणवत्ता की होने से इनका उपयोग भी नहीं किया जा सकता।

तो बन जाएंगे कबाड़

बताया जाता है कि उस वक्त यह भी विचार किया गया था कि कोविड काल खत्म होने के बाद इनका उपयोग अन्य अस्पतालों को ऑक्सीजन सिलेंडर के तौर पर बेचना था यानी प्लांट बेकार नहीं होने वाले थे। लेकिन प्रशासनिक स्तर पर इस बारे में कोई पहल और प्रयास ही नहीं किये गये।

यही वजह है कि लाखों रुपये खर्च करने के बाद भी उनका उपयोग जनता के लिए नहीं हो सका। जानकार बताते हैं कि यदि इसी तरह देखरेख नहीं की गई और बेकार पड़े रहे तो कुछ वर्षों बाद यह कबाड़ बन जाएंगे।

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