
निकाय चुनाव (सौजन्य-सोशल मीडिया)
Nagpur BJP Rebellion: नागपुर महानगरपालिका चुनाव-2026 के लिए उम्मीदवारों की घोषणा के बाद सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को अपने ही गढ़ में कड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा है। पार्टी के पारंपरिक वोट बैंक माने जाने वाले गुजराती, जैन, अग्रवाल, छापरू जैसे कोर वोटरों में से इस बार एक को भी टिकट नहीं दिया गया है जिस कारण विरोध का स्वर और बढ़ गया है।
हिंदी, पंजाबी भाषियों की संख्या भी कम बताई जा रही है। नागपुर में इन वोटरों की संख्या 5 लाख से अधिक बताई जा रही है। समाज के प्रबुद्ध लोगों का कहना है कि भाजपा के स्थानीय नेताओं ने इन समाजों को पूरी तरह से नाकार दिया है जो उचित नहीं है। वोट तोड़ने का काम स्थानीय नेताओं ने किया है।
स्थानीय राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि इस नाराजगी को समय रहते दूर नहीं किया गया तो इसका सीधा असर चुनाव परिणामों पर पड़ सकता है। पूर्व में एक न एक सीट निश्चित रूप से दी जाती रही है, इसलिए इस बार चर्चाओं का दौर काफी गर्म है।
नागपुर के व्यापारिक और शहरी क्षेत्रों में भाजपा की मजबूती का आधार रहे इन समाजों का कहना है कि पार्टी ने इस बार उनकी दावेदारी को दरकिनार कर दिया है। पिछली बार के चुनावों में गुजराती, अग्रवाल और जैन समाज के कुछ उम्मीदवार मैदान में थे जिनमें से कई ने जीत भी दर्ज की थी। इस बार इन समुदायों को उनकी जनसंख्या और प्रभाव के अनुपात में सीटें नहीं दी गई हैं।
टिकट नहीं मिलने से एक बड़े भूभाग पर इसका प्रत्यक्ष असर देखने को मिल सकता है। उत्तर भारतीय को कहीं न कहीं समावेश किया गया है लेकिन जनसंख्या के हिसाब से इसे भी कम माना जा रहा है। हिंदीभाषी मतदाताओं के बीच भी नाराजगी के स्वर हैं। इन वर्गों का आरोप है कि चुनाव प्रचार की समितियों और निर्णय लेने वाली प्रक्रियाओं में उन्हें उचित महत्व नहीं दिया जा रहा है।
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मुस्लिम प्रतिनिधित्व : भाजपा ने 151 सीटों में से केवल एक सीट (कामिल अंसारी – प्रभाग 8बी) पर मुस्लिम उम्मीदवार उतारा है जिसे लेकर अल्पसंख्यकों के बीच प्रतिनिधित्व की कमी पर बहस छिड़ गई है।
इस असंतोष पर भाजपा के वरिष्ठ नेताओं और जिले के प्रभारी का कहना है कि टिकटों का वितरण 4 सर्वेक्षणों के आधार पर किया गया है। पार्टी का तर्क है कि ‘एंटी-इंकम्बेंसी’ (सत्ता विरोधी लहर) को कम करने के लिए नये चेहरों को लाना आवश्यक था।
जानकारों का कहना है कि जब भारतीय जनता पार्टी ने सर्वे के आधार पर टिकट का बंटवार किया है तो फिर बाहरी लोगों को किस आधार पर शामिल किया गया है? क्या सर्वे ने यह बताया था कि बीजेपी के पुराने वफादार लोगों को छोड़कर बाहर से आने वालों को प्राथमिकता दी जाए? इन सब बातों से लोगों में अच्छी खासी नाराजगी देखी जा रही है।






