नागपुर हाई कोर्ट का सख्त रुख, बार-बार स्थगन मांगना पड़ा भारी; शिक्षा विभाग पर जुर्माना और तीखी टिप्पणी

Special Teachers Case: विशेष शिक्षकों के समायोजन मामले में बार-बार स्थगन मांगने और अदालत के निर्देशों का पालन नहीं करने पर नागपुर हाई कोर्ट ने स्कूल शिक्षा विभाग पर 15 हजार रुपये का जुर्माना लगाया।
Nagpur High Court takes a stern stance; repeatedly seeking adjournments proves costly; fine imposed on the Education Department along with sharp criticism.
नागपुर हाई कोर्ट, विशेष शिक्षक,(सोर्स-सोशल मीडिया)
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Nagpur Teacher Adjustment Case: विशेष शिक्षकों के समायोजन मामले में बार-बार स्थगन की मांग और न्यायालय के निर्देशों का पालन नहीं करने पर मुंबई हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने राज्य सरकार के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने इसे गैर-जिम्मेदाराना और अस्वीकार्य करार देते हुए स्कूल शिक्षा विभाग पर 15 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है।

मामला 30 अप्रैल 2025 के उस शासनादेश से जुड़ा है, जिसके तहत नागपुर महानगरपालिका के विशेष शिक्षकों का समायोजन नागपुर जिला परिषद में किया गया था। इस निर्णय के बाद जिला परिषद के कुछ शिक्षकों को कथित रूप से गलत तरीके से 'अतिरिक्त' (Surplus) घोषित किए जाने के विरोध में प्रभावित शिक्षकों ने हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ में कई रिट याचिकाएं दायर की हैं।

बार-बार स्थगन की मांग पर हाईकोर्ट नाराज

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति अनिल पानसरे और न्यायमूर्ति रजनीश व्यास की खंडपीठ के समक्ष सहायक सरकारी वकील (एजीपी) ने यह कहते हुए स्थगन की मांग की कि इसी विषय से जुड़ी अन्य याचिकाएं दूसरी खंडपीठ में लंबित हैं और सभी मामलों की एक साथ सुनवाई (क्लबिंग) आवश्यक है।

हालांकि, अदालत ने 17 अप्रैल 2026 के अपने पूर्व आदेश का हवाला देते हुए कहा कि तब सरकारी पक्ष ने स्वयं बताया था कि सभी याचिकाओं की क्लबिंग के लिए प्रशासनिक न्यायाधीश के समक्ष प्रस्ताव भेज दिया गया है। मौजूदा सुनवाई में सरकारी वकील ने स्वीकार किया कि वह जानकारी अनजाने में गलत दी गई थी।

हाईकोर्ट सख्त, शिक्षा विभाग पर 15 हजार का जुर्माना

इस पर खंडपीठ ने कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि यदि पहले दी गई जानकारी गलत थी, तो उसे तत्काल न्यायालय के संज्ञान में लाना सरकारी पक्ष का दायित्व था। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि पूर्व आदेश के बावजूद राज्य सरकार को पर्याप्त समय मिलने के बाद भी जवाबी हलफनामा दाखिल नहीं किया गया, जो न्यायालय के निर्देशों की अनदेखी को दर्शाता है।

खंडपीठ ने राज्य सरकार के इस रवैये को गंभीर मानते हुए स्कूल शिक्षा विभाग पर 15,000 रुपये का जुर्माना लगाया और स्पष्ट किया कि न्यायालय के आदेशों की अवहेलना किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं की जाएगी।

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