

Nagpur High Court Challange: नागपुर हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र के नये जेल नियमों के उस कड़े प्रावधान पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं जिसके तहत मकोका, पॉक्सो और आतंकवाद जैसे गंभीर अपराधों में सजा काट रहे कैदियों को फरलो देने पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई है।
न्यायाधीश अनिल पानसरे और न्यायाधीश निवेदिता मेहता ने माना है कि केवल अपराध की प्रकृति के आधार पर फरलो पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और 21 (जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन हो सकता है।
इस महत्वपूर्ण कानूनी सवाल को अंतिम निर्णय के लिए अब एक बड़ी बेंच (3 जजों की बेंच) के पास भेज दिया गया है। हत्या और मकोका के तहत आजीवन कारावास की सजा भुगत रहे रोहित तंगप्पा नामक कैदी की ओर से हाई कोर्ट (High Court) में याचिका दायर की गई।
रोहित ने पारिवारिक कारणों से 28 दिन की फरलो (छुट्टी) मांगी थी लेकिन अमरावती सेंट्रल जेल के अधीक्षक ने 2 दिसंबर 2024 को जारी महाराष्ट्र जेल (फरलो और पैरोल) नियम, 2024 का हवाला देते हुए उसकी अर्जी खारिज कर दी। नये नियमों के नियम 4(2)(e) के अनुसार मकोका, पॉक्सो, एनडीपीएस और आतंकवाद से जुड़े मामलों के दोषियों को फरलो के अयोग्य माना गया है।
सुनवाई के बाद अदालत ने कहा कि नियम 3 के तहत फरलो देने का मुख्य उद्देश्य कैदी को परिवार के संपर्क में रखना, जेल की निरंतर कैद के मानसिक तनाव से राहत देना और भविष्य के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करना है।
अदालत ने सवाल किया कि गंभीर अपराधों के कैदियों को परिवार से दूर रखने या उन्हें सुधरने की उम्मीद से वंचित करने का क्या औचित्य है? राज्य सरकार ऐसा कोई ठोस कारण नहीं बता पाई कि इन कैदियों पर जेल की लंबी कैद का हानिकारक प्रभाव क्यों नहीं पड़ेगा।
हाई कोर्ट (High Court) ने कहा कि मकोका जैसे संगठित अपराधों में एक छोटे स्तर के सूचना देने वाले अपराधी और सरगना की भूमिका अलग-अलग होती है। इन सभी को एक ही तराजू में तौलना ‘असमान लोगों के साथ समान व्यवहार’ करने जैसा है जो सीधे तौर पर अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।
इसी तरह, पॉक्सो के कई मामलों में किशोरों के बीच आपसी सहमति से बने संबंधों को भी अपराध मान लिया जाता है। अदालत ने कहा कि अगर किसी 19 साल के छात्र को आपसी सहमति वाले संबंध के कारण पॉक्सो में सजा हो जाती है और उसे फरलो से पूरी तरह वंचित रखा जाता है तो यह उसके अधिकारों का गंभीर हनन है।
अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची कि 2024 के नियमों का नियम 4(2)(e) असंवैधानिक है। हालांकि चूंकि हाई कोर्ट की पिछली 2 डिवीजन बेंच (पुंडलिक जी. गोले और संतोष नामदेव भुकन मामलों में) जन सुरक्षा के नाम पर गंभीर अपराधों में फरलो पर रोक को पहले वैध ठहरा चुकी हैं, इसलिए वर्तमान बेंच ने सीधे तौर पर इस नियम को रद्द करने से परहेज किया।
बेंच ने मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध किया है कि इस मुद्दे पर एक बड़ी बेंच का गठन किया जाए, जो यह तय करेगी कि क्या विशिष्ट कानूनों के तहत दोषी कैदियों को फरलो देने पर पूर्ण रोक लगाने वाला नियम 4(2)(e) संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के साथ-साथ पुनर्वास के उद्देश्यों का उल्लंघन है या नहीं।