नासिक में मराठी स्कूलों पर संकट, सरकारी नीतियां और निजी दौड़; अस्तित्व की लड़ाई जारी

Nashik Zilla Parishad Schools: नासिक में मराठी माध्यम के जि.प. स्कूल घटते जा रहे हैं। सरकारी नीतियों और निजी शिक्षा की दौड़ ने इनके अस्तित्व पर संकट खड़ा कर दिया है।
Crisis Facing Marathi Schools in Nashik: Government Policies and the Private Sector Race—The Battle for Survival Continues
मराठी स्कूल संकट( सोर्स: सोशल मीडिया )
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Nashik Education Crisis: नासिक जिला परिषद के प्राथमिक विद्यालय आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। जिस मराठी, स्कूल ने पीढ़ियों से इंसान बनाया और जीवन को दिशा दी, वही आज बंद होने की कगार पर हैं।

यह गंभीर वास्तविकता काजले ने अत्यंत मार्मिक शब्दों में समाज के सामने रखी, काजले ने कहा कि एक ओर सरकार कम छात्र संख्या वाले स्कूलों पर ताला लगा रही है।

तो दूसरी ओर अभिभावक स्वयं अपने बच्चों को निजी शिक्षा की अंधी दौड़ में धकेल रहे हैं। इस दोहरी मार के कारण मराठी स्कूल न केवल कम हो रहे हैं।

बल्कि धीरे-धीरे समाप्त हो रहे हैं। उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि यदि आज मराठी स्कूल नहीं बचे, तो कल शिक्षा को केवल खरीदा जा सकेगा। मराठी स्कूलों के बंद होने के पीछे उन्होंने केवल सरकारी नीतियों को ही नहीं, बल्कि सामाजिक मानसिकता को भी जिम्मेदार ठहराया।

उन्होंने स्पष्ट किया कि स्वयं मराठी स्कूल में पढ़कर जीवन में सफल हुए अभिभावक आज अपने बच्चों के लिए मराठी स्कूलों को नकार रहे हैं, जो एक बड़ी त्रासदी है।

निजी शिक्षा के नाम पर होने वाले भारी-भरकम खर्च का विवरण देते हुए उन्होंने बताया कि केजी से दसवीं तक शिक्षा के लिए प्रति वर्ष 50 हजार से 2.5 लाख रुपये तक खर्च होते हैं।

12 वर्षों में यह राशि 6 लाख से 30 लाख रुपये तक पहुंच जाती है। उन्होंने दूरदृष्टि रखते हुए कहा कि यदि यही पैसा बच्चों के भविष्य के लिए बचाया जाए, तो वह व्यवसाय या करियर शुरू करने के काम आ सकता है।

...तो शिक्षा बन जाएगी सिर्फ अमीरों का साधन

काजले ने चेतावनी दी कि यदि मराठी स्कूल बंद हुए। तो शिक्षा एक अधिकार न रहकर केवल अमीरों का साधन बन जाएगी, गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारी के लिए शिक्षा एक दूर का सथना हो जाएगी, जिससे सामाजिक समानता खत्म हो जाएगी। अंत में उन्होंने मार्मिक अपील करते हुए कहा 'म' का अर्थ मातृभाषा, मिट्टी और मानवता है। यदि यह 'म' खो गया, तो हम भी अपनी पहचान खो देंगे, समय रहते निर्णय लें और अपने बच्चों को मराठी स्कूलों में भेजें, वरना भविष्य में केवल पछतावा ही शेष रहेगा,

जिला परिषद स्कूलों में भी बच्चों को मिलती है गुणवत्तापूर्ण शिक्षा

उन्होंने दृढ़ता से कहा कि जिला परिषद के मराठी स्कूल मुफ्त सुविधाओं के बावजूद मूल्य आधारित और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दे रहे है। इन्हीं स्कूलों से निकले छात्र आज बड़े अधिकारी, शिक्षक और उद्यमी बनकर समाज का गौरव बढ़ा रहे हैं।

उन्होंने अभिभावकों को आईना दिखाते हुए कहा कि बच्चों पर असली निवेश पैसे का नहीं, बल्कि आपके समय, ध्यान और संस्कारों का होता है। जो अभिभावक निजी स्कूलों के एक कोन पर समय निकाल लेते हैं, वे गांव के सरकारी स्कूल में शिक्षकों से संवाद करने में कतराते हैं।

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