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महाबोधि विहार: सुप्रीम कोर्ट से नहीं मिली राहत, बौद्ध अनुयायियों का फूटा गुस्सा
पवित्र स्थल महाबोधि विहार को लेकर चल रहे मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि इस विवाद पर वह अनुच्छेद 32 के तहत सुनवाई नहीं करेगा।
- Written By: आंचल लोखंडे

महाबोधि विहार: सुप्रीम कोर्ट से नहीं मिली राहत (सौजन्यः सोशल मीडिया)
नागपुर: बौद्ध धर्मावलंबियों की आस्था के सबसे पवित्र स्थल महाबोधि विहार के प्रबंधन को लेकर सोमवार को एक ऐतिहासिक मोड़ आया। सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि इस विवाद पर वह अनुच्छेद 32 के तहत सुनवाई नहीं करेगा। याचिकाकर्ता को उच्च न्यायालय जाने का विकल्प खुला रखा गया है। इस फैसले ने बौद्ध समाज में गहरा असंतोष और आक्रोश पैदा किया है। बौद्ध अनुयायियों का कहना है, “यह हमारा पवित्र अधिकार है, महाकारूणिक तथागत सिद्धार्थ गौतम बुद्ध के ज्ञानस्थल पर हमारा ही अधिकार होना चाहिए। इसे हिंदू बहुसंख्यक समिति के हवाले रखना धार्मिक स्वतंत्रता का हनन है।”
बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए महाबोधि विहार केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि महाकारूणिक तथागत सिद्धार्थ गौतम बुद्ध की आत्मज्योति का प्रतीक है। यहीं ईसा पूर्व 5वीं शताब्दी में बोधी वृक्ष के नीचे तपस्या करते हुए बुद्ध को बोधि (ज्ञान) प्राप्त हुआ। सम्राट अशोक ने इस स्थल पर पहली बार विहार और स्तूप का निर्माण करवाया। यह स्थान युनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता प्राप्त है। बौद्ध अनुयायी कहते हैं “यह हमारे धर्म की आत्मा है। इसका प्रबंधन हमारे बिना कैसे हो सकता है?”
विवाद की जड़
आजादी के बाद 1949 में बिहार सरकार ने बोधगया मंदिर अधिनियम बनाया, जिसके तहत मंदिर का प्रबंधन एक 9 सदस्यीय समिति को सौंपा गया। जिसमें 4 बौद्ध सदस्य, 4 हिंदू सदस्य और जिलाधिकारी अध्यक्ष (अधिकतर हिंदू) है। बौद्ध संगठनों का आरोप है, “संयुक्त प्रबंधन के नाम पर हिंदू बहुसंख्यक प्रभाव थोपा गया है।” “जिलाधिकारी के हाथ में अध्यक्षता होने से निर्णयों पर बौद्धों की आवाज दबती है।” “मुख्य पुजारी आज भी हिंदू ब्राह्मण होते हैं।” बौद्ध अनुयायियों के मुताबिक “हम अनुच्छेद 25 (धर्म-स्वतंत्रता), 26 (धार्मिक संस्थाओं का प्रबंधन) और 29 (सांस्कृतिक अधिकार) के तहत यह हक़ मांग रहे हैं।”
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सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?
पूर्व राज्य मंत्री और सामाजिक कार्यकर्ता सुलेखा कुंभारे ने याचिका दाखिल कर 1949 के कानून को असंवैधानिक बताते हुए विहार का संपूर्ण प्रबंधन बौद्धों को सौंपने की मांग की थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा, “हम अनुच्छेद 32 के तहत इस याचिका की सुनवाई नहीं करना चाहते। लेकिन याचिकाकर्ता चाहें तो उच्च न्यायालय में जा सकते हैं।”
बौद्ध अनुयायियों में नाराजगी
फैसले के बाद बौद्ध संगठनों में तीव्र असंतोष है। “यह सिर्फ एक भवन नहीं बल्कि यह महाकारूणिक तथागत सिद्धार्थ गौतम बुद्ध की साधना और करुणा का प्रतीक है।” उनका कहना है कि “इस पवित्र स्थल का प्रबंधन हिंदू बहुसंख्यक समिति के पास रखना धार्मिक आज़ादी का अपमान है।” “यह सांस्कृतिक गुलामी का प्रतीक नहीं बनना चाहिए।” कई संगठनों ने आंदोलन की चेतावनी दी है। उनका कहना है “हम इस अन्याय के खिलाफ लंबी कानूनी और जन आंदोलन की तैयारी करेंगे।”
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इतिहास की परतें-कैसे उपजा विवाद?
बुद्ध के निर्वाण के बाद सदियों तक यह स्थल बौद्ध धर्म का केंद्र रहा। सम्राट अशोक ने 3वीं शताब्दी ईसा पूर्व में इसका कायाकल्प किया। मध्यकाल में बौद्ध धर्म के पतन के बाद मंदिर पर हिंदू ब्राह्मण पुजारियों का वर्चस्व हो गया। आज़ादी के बाद बौद्ध समाज ने इसे पाने के लिए आंदोलन चलाया। 1949 में बोधगया मंदिर अधिनियम बना, जिसमें बौद्धों को समिति में 4 सीटें मिलीं मगर प्रमुख पुजारी हिंदू ही बना रहा।
सरकार की दलील क्या है?
बिहार सरकार और केंद्र का रुख है कि महाबोधि विहार केवल बौद्धों का ही नहीं, यह साझा विरासत है। संयुक्त प्रबंधन से सभी समुदायों का सम्मान और संरक्षण होता है। जिलाधिकारी के अध्यक्ष रहने से निष्पक्षता बनी रहती है।
आगे की लड़ाई
सुप्रीम कोर्ट के इनकार के बाद याचिकाकर्ता उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाएंगी। बौद्ध संगठन बड़े आंदोलन और अभियान की तैयारी में हैं। यह मुद्दा सिर्फ प्रबंधन का नहीं धर्म और सांस्कृतिक अस्मिता का भी है।
Mahabodhi vihar no relief from supreme court buddhist followers erupted in anger
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