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क्षमता 4 की, पैसेंजर 8! नागपुर के ऑटो व ई-रिक्शा चालकों का अनोखा गणित- ड्राइवर की गोद को छोड़कर हर जगह है सीट!
- Written By: अंकिता पटेल
Nagpur Auto Rickshaw: नागपुर में ऑटो और ई-रिक्शा की बढ़ती संख्या, ओवरलोडिंग और अव्यवस्थित संचालन से ट्रैफिक जाम व सड़क सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं।

नागपुर, ऑटो रिक्शा, ई-रिक्शा, ओवरलोडिंग (सोर्स: नवभारत फाइल फोटो)
Nagpur Auto Rickshaw Overloading: नागपुर रेलवे स्टेशन, गणेशपेठ बस स्टैंड, सीताबर्डी, इतवारी, पारडी, कॉटन मार्केट, मेडिकल चौक और शहर के प्रमुख मेट्रो स्टेशनों के बाहर रोज एक जैसी तस्वीर दिखाई देती है। सवारी के इंतजार में खड़े ऑटो और ई-रिक्शा, यात्रियों की भीड़, सड़क पर रुकते वाहन और धीरे-धीरे बढ़ता ट्रैफिक जाम।
शहर में ऑटो और ई-रिक्शा आम लोगों के लिए सबसे आसान परिवहन साधन बन चुके हैं, लेकिन इनके संचालन से जुड़ी कई समस्याएं अब चिंता का विषय बन रही हैं। कई स्थानों पर चार सवारी की क्षमता वाले वाहनों में छह से आठ यात्रियों तक को बैठाया जा रहा है।
कई बार चालक के अगल-बगल भी यात्री बैठे दिखाई देते हैं। इससे न केवल दुर्घटना का खतरा बढ़ रहा है, बल्कि यातायात व्यवस्था भी प्रभावित हो रहा है। दूसरी ओर ऑटो और ई-रिक्शा चालक इसे अपनी मजबूरी बताते हैं। उनका कहना है कि महंगाई, बढ़ते खर्च और सीमित आय के कारण उन्हें ऐसा करना पड़ता है।
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मेट्रो के बाद भी ऑटो पर निर्भर शहर
नागपुर में मेट्रो सेवा के विस्तार के बाद प्रजापति नगर से लोकमान्य नगर और खापरी से ऑटोमोटिव चौक तक हजारों लोगों का सफर आसान हुआ है। शहर के उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम हिस्सों से छात्र, नौकरीपेशा कर्मचारी, व्यापारी और आम नागरिक रोजाना मेट्रो का उपयोग करते हैं। इसके बावजूद मेट्रो स्टेशन से घर, कार्यालय, कॉलेज, कोचिंग सेंटर और बाजार तक पहुंचने के लिए लोगों की निर्भरता आज भी ऑटो और ई-रिक्शा पर बनी हुई है।
सवारी को लेकर प्रतिस्पर्धा
सुबह और शाम के समय लगभग हर प्रमुख मेट्रो स्टेशन के बाहर ऑटो और ई-रिक्शा की लंबी कतारें दिखाई देती हैं। यही वजह है कि इन क्षेत्रों में सवारी को लेकर प्रतिस्पर्धा और ट्रैफिक दबाव लगातार बढ़ रहा है। कई लोगों का कहना है कि यदि मेट्रो स्टेशनों के बाहर बेहतर फीडर सेवा और व्यवस्थित ऑटो स्टैंड विकसित किए जाएं तो काफी हद तक समस्या कम हो सकती है।
चार सवारी में घर नहीं चलता
साहब, लोग बोलते हैं ज्यादा सवारी मत बैठाओ लेकिन कोई ये नहीं पूछता कि घर कैसे चलता है, पेट्रोल महंगा है, गाड़ी की मरम्मत महंगी है, बच्चों की फीस भरनी है, राशन लाना है। चार सवारी लेकर चलेंगे तो दिनभर की कमाई में कुछ नहीं बचेगा।
– इतवारी, ऑटो चालक, आशीष शर्मा
चार्जिंग का खर्च बढ़ गया
बैटरी चार्जिंग का खर्च बढ़ गया है। किस्त भी भरनी पड़ती है। सुबह से रात तक गाड़ी चलाने के बाद भी घर चलाना मुश्किल हो रहा है।
रोशन वर्मा, ई-रिक्शा चालक, पारडी
महिलाएं संभाल रही हैं परिवार
नागपुर की सड़कों पर अब बड़ी संख्या में महिलाएं भी ऑटो और ई-रिक्शा चलाकर परिवार का खर्च उठा रही हैं, कई महिलाओं ने आर्थिक संकट और परिवार की जिम्मेदारी के कारण यह पेशा अपनाया है।
हम भी किसी से कम नहीं
घर में कमाने वाला कोई नहीं था। बच्चों की पढ़ाई और घर का खर्च चलाने के लिए गाड़ी चलाना शुरू किया। शुरुआत में लोगों को अजीब लगता था, लेकिन अब सब सामान्य हो गया है। हम भी पुरुषों की तरह मेहनत करके परिवार चला सकते हैं।
– ई-रिक्शा चालक, शंकुतला बागड़े
घर का खर्चा नहीं चलता
सुबह बच्चों को स्कूल भेजती हूं। फिर गाड़ी लेकर निकल जाती हूं। बारिश हो या गर्मी, काम तो करना ही पड़ता है। घर बैठकर खर्च नहीं चलता।
– ई-रिक्शा चालक, आशा मोरे
सवारी के लिए होड़, बढ़े विवाद
शहर में ऑटो और ई-रिक्शा की संख्या लगातार बढ़ी है। ऐसे में सवारी को लेकर प्रतिस्पर्धा भी बढ़ गई है। रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड और बाजार क्षेत्रों में अक्सर सवारी लेने के लिए चालकों के बीच विवाद की स्थिति बन जाती है।
-ई-रिक्शा चालक पार्वती सोलंके
सवारी नहीं तो दूसरा ले जाएगा
पहले जितनी सवारी मिलती थी, अब उतनी नहीं मिलती। गाड़ियां बहुत बढ़ गई है। एक सवारी दिखती है तो चार-पांच ऑटो वाले पीछे पड़ जाते हैं। कई बार इसी बात पर झगड़ा हो जाता है।
– ऑटो चालक, खुशाल साहू
यात्रियों की जान पर बढ़ता खतरा
स्थानीय लोगों का कहना है कि कुछ क्षेत्रों में सवारी को लेकर हाथापाई की घटनाएं भी सामने आती रहती है। हालांकि अधिकांश विवाद मौके पर ही शांत हो जाते हैं। क्षमता से अधिक सवारी बैठाने की वजह से यात्रियों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। कई बार चालक के दोनों ओर यात्री बैठे दिखाई देते हैं। ऐसे में वाहन चालक का संतुलन और दृश्यता दोनों प्रभावित होते हैं।
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सामने बैठना खतरनाक
पीछे जगह नहीं होती तो सामने भी बैठा लेते हैं। अचानक ब्रेक लग जाए या दुर्घटना हो जाए तो सबसे पहले सामने
बैठा व्यक्ति घायल होगा।
– यात्री, पंकज गावंडे
देर होने से अच्छा है किसी तरह पहुंच जाएं
हम जानते हैं कि यह गलत है, लेकिन कई बार कोई दूसरा वाहन नहीं मिलता, कॉलेज पहुंचने की जल्दी रहती है। कई बार आधा घंटा इंतजार करने का समय नहीं होता। इसलिए लोग भरे हुए ऑटो में भी बैठ जाते
– राहुल साहू यात्री
समय की कमी और मजबूरी
ऑफिस समय पर पहुंचना होता है। हर बार खाली वाहन मिलने का इंतजार नहीं कर सकते, समय की कमी के कारण मजबूरी में बैठना पड़ता है।
– महिला कर्मचारी, माया गुरुपंच
पेट की मजबूरी ने बढ़ाया जोखिम ऑटो और ई-रिक्शा चालकों का कहना है कि बढ़ती महंगाई ने उनकी आर्थिक स्थिति को प्रभावित किया है। पेट्रोल, सीएनजी, बैटरी चार्जिंग, वाहन रखरखाव और घरेलू खर्च लगातार बढ़ रहे हैं। ऐसे में कम सवारी लेकर वाहन चलाना उनके लिए घाटे का सौदा बनता जा रहा है।
-नवभारत लाइव के लिए नागपुर से अनुज साहू की रिपोर्ट
Auto e rickshaw overloading nagpur traffic congestion commuter safety concerns
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