
(प्रतीकात्मक तस्वीर)
Mumbai News In Hindi: न्यायिक प्रणाली में प्रक्रियात्मक चूक और आदेशों की अवहेलना पर मुंबई सत्र अदालत ने सख्त रुख अपनाया है। एक आरोपी को जमानत मिलने के बावजूद रिहा न करने पर सत्र न्यायाधीश ने कुर्ला के मजिस्ट्रेट को फटकार लगाते हुए उनके व्यवहार को ‘स्पष्ट अवज्ञा’ (Clear Defiance) और कानून का उल्लंघन बताया है।
यह मामला नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट (Check Bounce Case) के आरोपी गणेश त्रिभुवन से जुड़ा है। सत्र अदालत ने 2 जनवरी को त्रिभुवन को जमानत देने का आदेश जारी किया था। नियमानुसार, जमानत की शर्तें पूरी होने के बाद आरोपी की तत्काल रिहाई होनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। पांच दिनों तक आरोपी के जेल में रहने के बाद, उनके वकील ने अदालत से हस्तक्षेप की मांग की, जिसके बाद मजिस्ट्रेट की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हुए।
अदालत के रिकॉर्ड (रोजनामा) के अनुसार, न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (कुर्ला), संतोष गारड ने 6 जनवरी को रिहाई पत्र जारी किया था। हालांकि, इसके तुरंत बाद एक चौंकाने वाला मोड़ आया। मजिस्ट्रेट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए अपने ही आदेश को “कानून की दृष्टि में अनधिकृत और अमान्य” घोषित कर दिया और उसे वापस ले लिया।
सत्र न्यायाधीश मुजिबुदीन समदसाब शेख ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि मजिस्ट्रेट ने यह भी निर्देश दे दिया था कि बिना किसी “स्पष्ट न्यायिक आदेश” के कोई रिहाई पत्र जारी न किया जाए, जो कि ऊपरी अदालत के आदेश की अवहेलना है।
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मुंबई के सत्र न्यायाधीश ने मजिस्ट्रेट की इस कार्रवाई को “अवैध और गैरकानूनी” करार दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब एक बार जमानत की शर्तें पूरी कर ली गईं, तो आरोपी को एक मिनट भी जेल में रखना उसकी स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का हनन है। अदालत ने इसे ‘अवैध हिरासत’ (Illegal Detention) की श्रेणी में रखा।
सत्र अदालत ने न केवल आरोपी को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया, बल्कि संबंधित मजिस्ट्रेट को कारण बताओ नोटिस भी जारी किया है। नोटिस में मजिस्ट्रेट से स्पष्टीकरण मांगा गया है कि उनके द्वारा की गई इस ‘अवज्ञा’ और इसके परिणामस्वरूप हुई अवैध हिरासत के लिए उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश क्यों न की जाए। यह कदम न्यायिक जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में एक बड़ा संदेश माना जा रहा है।






