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मस्जिद बंदर स्टेशन का टीपू सुल्तान से क्या है कनेक्शन? जानें मैसूर के शासक और यहूदी सैनिक का दिलचस्प रहस्य
Masjid Bunder Station Story: क्या आप जानते हैं मुंबई के 'मस्जिद' स्टेशन का नाम किसी मुस्लिम इबादतगाह पर नहीं बल्कि एक यहूदी धर्मस्थल पर पड़ा है? जानिए टीपू सुल्तान और इस स्टेशन के बीच का अनसुना इतिहास।
- Written By: आकाश मसने

मुंबई का मस्जिद बंदर स्टेशन व टीपू सुल्तान (सोर्स: सोशल मीडिया)
Masjid Bunder Station Tipu Sultan Connection: मुंबई की लाइफलाइन कही जाने वाली लोकल ट्रेन में अगर आप छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस (CSMT) से ठाणे की ओर बढ़ते हैं, तो सबसे पहला स्टेशन आता है मस्जिद बंदर। पहली बार नाम सुनने वाला कोई भी शख्स यही सोचेगा कि यहां पास में कोई बहुत पुरानी या मशहूर मस्जिद होगी। लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल जुदा और बेहद दिलचस्प है। इस स्टेशन के नाम का गहरा नाता मैसूर के शासक टीपू सुल्तान और एक यहूदी सेनापति के जीवनदान से जुड़ा है।
टीपू सुल्तान पर सियासी घमासान और मुंबई कनेक्शन
महाराष्ट्र की राजनीति में इन दिनों टीपू सुल्तान को लेकर पारा चढ़ा हुआ है। कांग्रेस नेता हर्षवर्धन सकपाल द्वारा छत्रपति शिवाजी महाराज की तुलना टीपू सुल्तान से किए जाने के बाद पुणे से मुंबई तक हिंसक झड़पें और प्रदर्शन देखने को मिले हैं। हालांकि इतिहास कहता है कि टीपू सुल्तान खुद कभी मुंबई नहीं आए, लेकिन उनके एक फैसले ने मुंबई के इस व्यस्ततम इलाके को उसकी पहचान दे दी।
कैद, माफी और ‘दया का द्वार’
यह कहानी शुरू होती है 18वीं सदी के उत्तरार्ध में। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में एक यहूदी सैनिक थे सैमुअल ईजेकील दिवेकर। मैसूर युद्ध के दौरान टीपू सुल्तान की सेना ने सैमुअल को बंदी बना लिया था। कहा जाता है कि जब उन्हें मौत की सजा दी जाने वाली थी, तब टीपू सुल्तान की मां ने हस्तक्षेप किया। उनके अनुरोध पर टीपू ने सैमुअल को माफ कर दिया और बाद में कैदियों की अदला-बदली के दौरान उन्हें रिहा कर दिया गया।
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अपनी जान बचने को ईश्वर का चमत्कार मानकर सैमुअल बॉम्बे (अब मुंबई) लौट आए। आभार प्रकट करने के लिए उन्होंने 1796 में एक धर्मस्थल बनवाया, जिसे ‘गेट ऑफ मर्सी सिनेगॉग’ (Gate of Mercy Synagogue) यानी ‘दया का द्वार’ कहा जाता है।
‘मस्जिद’ नाम कैसे पड़ा?
स्थानीय लोग इस सिनेगॉग को ‘जूनी मस्जिद’ (पुरानी मस्जिद) कहते थे। दरअसल, उस समय कोंकणी और मराठी भाषी लोग किसी भी गैर-हिंदू प्रार्थना स्थल के लिए अक्सर ‘मस्जिद’ शब्द का इस्तेमाल करते थे। यह यहूदी मंदिर सैमुअल स्ट्रीट पर स्थित है और इसी ‘मस्जिद’ (सिनेगॉग) के नाम पर इलाके का नाम ‘मस्जिद’ पड़ा।
‘बंदर’ शब्द का रहस्य
इलाके के नाम का दूसरा हिस्सा है ‘बंदर’। मराठी में बंदरगाह या पोर्ट को ‘बंदर’ कहा जाता है। चूंकि यह इलाका समंदर के किनारे था और यहां कर्नाक बंदर, दाना बंदर और मैलेट बंदर जैसे कई छोटे बंदरगाह थे, इसलिए स्टेशन और इलाके का नाम आधिकारिक रूप से ‘मस्जिद बंदर’ पड़ गया।
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मजगांव में टीपू के परिवार की मौजूदगी
टीपू सुल्तान का मुंबई से रिश्ता सिर्फ मस्जिद स्टेशन तक सीमित नहीं है। 1799 में टीपू की शहादत के बाद उनके परिवार के कई सदस्य देश के अलग-अलग हिस्सों में बिखर गए। उनके विस्तारित परिवार के एक सदस्य, नवाब अयाज अली, अपने परिवार के साथ मुंबई के मजगांव और भायखला इलाके में बस गए थे। नवाब अयाज की मृत्यु भी मुंबई में हुई और उनकी कब्र सालों तक मजगांव में मौजूद थी, जो इस शहर के साथ टीपू के वंशजों के ऐतिहासिक जुड़ाव को दर्शाती है।
आज का मस्जिद बंदर
आज यह इलाका मुंबई का सबसे बड़ा होलसेल मार्केट है। ‘इजराइल मोहल्ला’ के नाम से जाना जाने वाला यह क्षेत्र भारत की सबसे पुरानी यहूदी विरासत को संजोए हुए है। भले ही आज यहां यहूदियों की संख्या कम हो गई हो, लेकिन ‘मस्जिद’ स्टेशन का नाम हर दिन लाखों यात्रियों को उस दया की कहानी याद दिलाता है, जो सदियों पहले एक युद्ध के मैदान में दिखाई गई थी।
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