Mango Crisis 2026: इस बार सस्ते मिलेंगे हापुस! लेकिन निर्यात ठप होने से आम उत्पादकों की टूटी कमर
India Mango Export Crisis 2026: युद्ध के कारण आम का निर्यात ठप। हापुस की कीमतें ₹150 तक गिरीं। कोंकण के किसानों को भारी नुकसान, वाशी मंडी में माल का अंबार।
- Written By: अनिल सिंह
Mango Export Crisis प्रतीकात्मक तस्वीर (सोर्स AI)
Alphonso Price Drop Maharashtra: आम के शौकीनों के लिए इस साल की गर्मियां मिठास भरी हो सकती हैं, लेकिन इसकी कीमत महाराष्ट्र और कोंकण के आम उत्पादकों को अपने ‘खून-पसीने’ से चुकानी पड़ रही है। मध्य-पूर्व (Middle East) में चल रहे युद्ध और तनाव के कारण भारतीय आम का निर्यात पूरी तरह ठप पड़ गया है। इसका नतीजा यह है कि जो प्रीमियम हापुस (Alphonso) विदेशों में ऊंचे दामों पर बिकता था, वह अब स्थानीय मंडियों में आधे दामों पर उपलब्ध है।
भारत, जो दुनिया का सबसे बड़ा आम उत्पादक है, इस समय एक बड़े ‘सप्लाई ग्लट’ (अतिरिक्त माल) की स्थिति से गुजर रहा है।
निर्यात का गणित: खाड़ी देशों से यूरोप तक ब्रेक
भारत सालाना लगभग 60,000 से 70,000 मीट्रिक टन ताजे आमों का निर्यात करता है। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा संयुक्त अरब अमीरात (UAE) का है, जो अकेले 12,000 मीट्रिक टन आम खरीदता है। इसके अलावा सऊदी अरब, कुवैत, अमेरिका और जापान भी प्रमुख खरीदार हैं। 2026 के सीजन में निर्यात में रिकॉर्ड बढ़ोतरी की उम्मीद थी, लेकिन युद्ध के कारण कार्गो उड़ानों में कटौती और शिपिंग रूट प्रभावित होने से सारा माल घरेलू बाजारों में डंप हो गया है।
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हापुस और केसर की कीमतों में भारी गिरावट
निर्यात रुकने का सीधा असर कीमतों पर पड़ा है:
हापुस (अल्फांसो): निर्यात के लिए ₹300-₹400 प्रति किलो बिकने वाला हापुस अब स्थानीय मंडियों में ₹150-₹200 तक गिर गया है।
बंगनपल्ली और केसर: दक्षिण भारत के बंगनपल्ली की कीमतें ₹150 से गिरकर ₹60-₹70 तक पहुँच गई हैं। केसर और पायरी की कीमतों में भी 50% तक की कमी आई है।
वाशी एपीएमसी (Vashi APMC) में संकट की स्थिति
नवी मुंबई स्थित वाशी थोक बाजार में इस समय अफरा-तफरी का माहौल है। निर्यात के लिए पैक किए गए डिब्बे अब ट्रकों में ही सड़ रहे हैं।
लॉजिस्टिक्स फेलियर: कार्गो उड़ानों की कमी और पोर्ट पर माल रुकने से ट्रकों की लंबी कतारें लगी हुई हैं।
बर्बादी का डर: आम जल्द खराब होने वाला फल है। कोल्ड स्टोरेज की क्षमता सीमित होने के कारण व्यापारियों को डर है कि अगर निर्यात जल्द बहाल नहीं हुआ, तो करोड़ों का माल कचरे के ढेर में तब्दील हो जाएगा।
कोंकण के किसानों के लिए यह ‘दोहरी मार’ है। पहले बिन मौसम बरसात और खराब मौसम ने उत्पादन कम किया, और अब बचा-कुचा मुनाफा वैश्विक युद्ध की भेंट चढ़ रहा है।
