
सीएम देवेंद्र फडणवीस (सौजन्य-सोशल मीडिया)
CM Devendra Fadnavis with Navbharat: मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) सहित राज्य की 29 महानगरपालिकाओं के लिए मतदाता गुरुवार को वोटिंग करेंगे। मंगलवार को चुनाव प्रचार समाप्त होने के बाद मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने ‘नवभारत’ के साथ चुनाव प्रचार के दौरान पेश आई चुनौतियों व संभावित परिणामों सहित तमाम घटनाक्रमों पर विस्तार से चर्चा की।
इस दौरान उन्होंने दृढ़ता पूर्वक दावा किया कि मुंबई, नाशिक, पुणे, पिंपरी-चिंचवड, नागपुर, नवी मुंबई सहित कम से कम 26 मनपा में महायुति की सत्ता आएगी और महायुति अपना महापौर बनाएगी। सीएम देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि सत्ता आने के बाद वह बीएमसी में 25 वर्षों से लगी जंग को साफ करने के लिए व्यापक स्तर पर ओवरहालिंग यानी प्रशासनिक फेरबदल करेंगे।
चुनाव प्रचार के दौरान क्या आपको कोई डर महसूस हुआ?
नहीं मुझे डर जैसा कुछ महसूस नहीं हुआ। हां मुझे यह जर जरूर लग रहा है कि ज्यादा प्रतिशत में मतदान हुए तो हमारी जीत भी ज्यादा बड़ी हो जाएगी।
शिवाजी पार्क में राज-उद्धव की जो सभा हुई उसमें मुंबईकरों से संबंधित कुछ नहीं था। उनका पूरा फोकस अदाणी पर था, क्या आपको लगता है कि इससे लोगों का जो सेंटिमेंट था। वह थोड़ा स्विंग हुआ है?
उन्होंने जो कहा उसका हमने उसी मैदान पर अगले दिन जवाब भी दिया ना…
लेकिन उस सभा से आप लोग डिफेंसिव मोड़ में आ गए? आपने उनके सवाल का जवाब दिया।
नहीं, हमारे जवाब के बाद राज ठाकरे डिफेंसिव मोड में आ गए। उसके बाद के राज ठाकरे का भाषण आप लोग देख लें। सब कुछ साफ हो जाएगा। राजनीति में जवाब देना जरूरी होता है। यदि आप जवाब नहीं देंगे तो लोगों को नैरेटिव सेट करने का मौका मिलता है। लोग वही बातें बार-बार करते हैं और फिर दूसरे लोगों को वह झूठ भी सच लगने लगता है। वैसे मुझे लगता है कि अब मुंबई के इलेक्शन का पैटर्न बदल गया है। आप पिछले तीन-चार चुनावों के परिणाम उठाकर देख लें। साल 2014, 2019, 2024 में हम उद्धव ठाकरे के खिलाफ चुनाव लड़े और हमें ज्यादा सीटें मिलीं।
लेकिन तब मनसे अर्थात राज ठाकरे, उद्धव के खिलाफ थे।
राज ठाकरे का चुनावी राजनीति में बहुत ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ता है। इससे पहले वह कांग्रेस के साथ मिल कर चुनाव लड़े थे, लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा। वह अकेले लड़े तब भी स्थिति वही रही और अब वह उद्धव के साथ लड़ रहे हैं, तो मुझे नहीं लगता कि इससे कुछ खास फर्क पड़ेगा। साथ आने से मनसे को कोई खास लाभ मिलेगा। ऐसा मुझे नहीं लगता। हां, मुंबई में उद्धव को लाभजरूर मिलेगा, लेकिन राज ठाकरे को कुछ हासिल नहीं होगा।
सभाओं का विवरणः मुंबई-7, नागपुर-5, पुणे-2, व अन्य प्रत्येक-1: सांगली, अकोला, जालना, परभणी, नांदेड, धुले, लातूर, भिवंडी, उल्हासनगर, कल्याण, अहिल्यानगर, वसई विरार, मीरा भायंदर, सोलापुर, पिंपरी-चिंचवड, नाशिक, नवी मुंबई/
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ऐसा माना जा रहा है कि इस बार चुनाव में मुस्लिम वोटर कांग्रेस की बजाय उद्धव की शिवसेना के साथ जा सकते हैं।
हो सकता है। क्योंकि पिछले कुछ समय में यह पैटर्न देखने को मिला है। मुसलमानों में बीजेपी को हराने में सक्षम पार्टी के साथ जाने की धारणा प्रबल हुई है।
आपने नवी मुंबई को नया आर्थिक केंद्र बनाने का दावा किया है।
हां, क्षेत्रफल के हिसाब से देखें तो नवी मुंबई पुणे से बड़ा शहर है। वहां काफी संभावनाएं हैं इसलिए हम वहां हरसंभव सुविधा उपलब्ध करा रहे हैं।
इससे पहले भी बीजेपी ने इंडिया शाइनिंग का नारा दिया था।
हमारे दिवंगत नेता प्रमोद महाजन ने जब यह नारा दिया था तब यह चीज लोगों के लिए थोड़ी नयी थी। लोग इसे समझ नहीं पाए थे। लेकिन आज लोग हर क्षेत्र में हो रहे विकास को देख रहे हैं, समझ रहे हैं और महसूस कर रहे हैं। इसलिए अब यह सामयिक हो गया है। वैसे मैं आपको यह स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि मुंबई के बाहर ठाकरे बंधुओं का प्रभाव मुझे कहीं नजर नहीं आया।
सीट बंटवारे में आपने शिंदे की शिवसेना को ज्यादा सीटें दे दीं।
जब आप गठबंधन में आगे बढ़ते हैं तो कई बार आपको समझौता भी करना पड़ता है। कल्याण-डोंबिवली की बात करें, तो वहां हमारी ताकत 5% ज्यादा है। लेकिन हमने वहां समझौता किया है। जलगांव में हमारे 57 नगरसेवक थे, लेकिन हम 47 पर लड़ रहे हैं। गठबंधन में यह सब चलता है।
विकास की बात करते-करते आप अचानक मराठी मेयर पर कैसे आ गए?
मैने कहा न कि कई बार आरोपों और बातों का जवाब देना जरूरी हो जाता है। मुंबई से बाहर किसी ने हमारे नेता कृपाशंकर सिंह से उत्तर भारतीय महापौर के बारे में पूछ लिया। उन्होंने कहा कि उतनी संख्या में उत्तर भारतीय नगरसेवक चुनाव जीतेंगे तो उत्तर भारतीय मेयर भी बन सकता है। उनके उस बयान को मुंबई में प्रचारित करके नैरेटिव सेट करने का प्रयास शुरू हो गया। उस पर एमआईएम ने बुर्के वाली महापौर का राग छेड़ दिया। इसलिए मैंने लोगों को आश्वस्त किया कि मुंबई का महापौर हिंदू-मराठी ही होगा।
पूर्व डीजीपी रश्मि शुक्ला ने एक रिपोर्ट सौंपी है, जिसमें दावा किया गया है कि मुंबई पुलिस के तत्कालीन आयुक्त संजय पांडेय ने आपको और एकनाथ शिंदे को जेल में डालने का प्रयास किया था। क्या कोई कार्रवाई की जाएगी?
रश्मि शुक्ला ने रिपोर्ट नहीं सौंपी है। बल्कि तीन अधिकारियों वाली स्पेशल टीम ने उन्हें यह रिपोर्ट दी थी, जो कि होम डिपार्टमेंट के पास आई है। मैं चुनाव प्रचार में व्यस्त था इसलिए अभी उस बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं है। यदि उसमें कार्रवाई जैसा कुछ होगा तो जरूर कार्रवाई करेंगे।
आपका मानना है कि मुंबई बीएमसी में आपकी सत्ता आ रही है। क्या आप बीएमसी में बीते 25 वर्षों में हुए भ्रष्टाचार की क्या जांच कराएंगे?
हम जान-बूझकर बदले की भावना से कोई कार्रवाई नहीं करेंगे। लेकिन प्रॉसेस में यदि कोई खुलासा होता है तो कार्रवाई जरूर की जाएगी।
चुनाव प्रचार खत्म हो गया है। पूरे राज्य के चुनावी माहौल के आधार पर आपका क्या अनुमान है?
सभी 29 महानगर पालिकाओं में बीजेपी और महायुति के लिए सकारात्मक माहौल देखने को मिला। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि कम से सत्ता आएगी। कम 26 से 27 महापालिकाओं में महायुति की सत्ता आएगी।
आप इतने आत्मविश्वास के साथ इतना बड़ा दावा कैसे कर रहे हैं?
इस चुनाव में विपक्ष के पास खुद को साबित करने का एक सुनहरा अवसर था, लेकिन विपक्ष के हौसले पहले से ही पस्त नजर आए। प्रचार के दौरान विपक्ष कहीं नजर नहीं आया। हम यह कह सकते हैं कि विपक्ष हमें चुनौती देने में नाकाम सिद्ध हुआ है।
उद्धव ठाक ठाकरे और राज ठाकरे के एक साथ आने के बाद आपको किस तरह की चुनौती मिली, ठाकरे ब्रांड का सामना आपने कैसे किया ?
देखिए, राजनीति में चीजें अचानक नहीं बदलतीं। इस बात का मुझे क्रेडिट देना होगा कि हमसे लड़ने के लिए दोनों भाई एक साथ आए। उन्होंने ‘मराठी’ का मुद्दा उठाकर एक सहानुभूति लेने की कोशिश की, लेकिन ऐसा पहली बार नहीं है। पिछले दो चुनावों में बीजेपी इस तरह के मुद्दों का सामना करते हुए विजय हासिल कर चुकी है। लोग विकास को देखकर वोट करते हैं। जहां तक ठाकरे ब्रांड की बात है, तो ब्रांड सिर्फ बालासाहब ठाकरे थे। अब देश में कोई ब्रांड है तो सिर्फ मोदी ब्रांड है।
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तो आपको क्या लगता है, चुनाव के बाद ठाकरे बंधुओं का सियासी अस्तित्व खत्म हो जाएगा?
मैं ऐसा बिलकुल भी नहीं मानता कि सियासी भविष्य खत्म हो जाता है। कौन कोई चुनाव हारने से किसी पार्टी या नेता का जीतेगा या कौन हारेगा, यह नेता के काम पर निर्भर करता है और उसी के आधार पर जनता निर्णय लेती है। सबकी राजनीति चलती है और कोई खत्म नहीं होता। आप काम करके अगली बार फिर से वापसी कर सकते हैं।
अंबरनाथ-अकोट पैटर्न स्वीकार्य नहीं
राज्य में वैसे तो बीजेपी पहले ही मजबूत नजर आ रही है लेकिन अंबरनाथ और अकोट में जो कुछ हुआ, उसके बाद बीजेपी के बारे में लोगों में गलत मैसेज गया है। क्या बीजेपी सता के लिए राज्य की दूसरी मनपाओं में भी अंबरनाथ पैटर्न आजमायेगी ।
देखिए, बीजेपी पूरे राज्य में सत्ता हासिल करने का लक्ष्य जरूर रखती है लेकिन उसके लिए अंबरनाथ या अकोट जैसा रास्ता अपनाना हमे बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं है। असल में ये स्थानीय नेताओं की गलती थी। उनके खिलाफ एक्शन लिया गया है।
राज्य की महायुति सरकार में आप लोग साथ हैं फिर भी पुणे, पिंपरी-चिंचवड़ और नवी मुंबई में जो कुछ भी देखने को मिल रहा है, क्या उससे गलत संदेश नहीं गया है?
दरअसल, अलग चुनाव लड़ने का निर्णय हमने कार्यकर्ताओं की डिमांड पर लिया, लेकिन हमने तय किया था कि महायुति में शामिल कोई भी पार्टी या नेता, सहयोगी दलों या उनके किसी नेता के खिलाफ व्यक्तिगत टीका-टिप्पणी नहीं करेगा। फिर भी पुणे में उप मुख्यमंत्री अजित पवार ने मर्यादा तोड़ी, तो वहीं नवी मुंबई में डीसीएम एकनाथ शिंदे के खिलाफ बीजेपी नेता गणेश नाईक की बयानबाजी भी दुर्भाग्यपूर्ण रही। (देखें प्लस)






