
98वे अखिल भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलन। (सौजन्यः सोशल मीडिया)
मुंबई: प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी 21 फरवरी को 98वें अखिल भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलन का उद्घाटन करेंगे। यह देश भर के लेखकों और आलोचकों को एक साथ लाएगा। सम्मेलन पहली बार 1878 में प्रसिद्ध विद्वान और समाज सुधारक महादेव गोविंद रानाडे के अध्यक्ष के रूप में आयोजित किया गया था, और 1926 से लगभग हर साल आयोजित किया जाता है।
यह बदलते समय में मराठी की प्रासंगिकता सहित कई मुद्दों पर विचार-विमर्श करने के लिए विद्वानों, आलोचकों, और साहित्यकारों को एक साथ लाता है। मराठी लोक साहित्य, संस्कृति, और परंपराओं की जानी-मानी विशेषज्ञ और थिएटर कलाकार तारा भावलकर इस सम्मेलन की अध्यक्ष हैं, जो 71 वर्षों के अंतराल के बाद राष्ट्रीय राजधानी में लौट रही हैं।

अखिल भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलन मराठी भाषा का भव्य उत्सव है, जो अपनी समृद्ध साहित्यिक परंपरा और शालीनता की महिमा को दर्शाता है। मराठी भाषा केवल संचार का माध्यम नहीं है, बल्कि पूरे महाराष्ट्र के लोगों की धड़कन है। इस वर्ष 98वां अखिल भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलन नई दिल्ली में आयोजित किया जा रहा है। यह सम्मेलन मराठी भाषा, साहित्य और संस्कृति के लिए एक ऐतिहासिक क्षण होगा।
मराठी भाषा की यात्रा सिर्फ कुछ सदियों की नहीं, बल्कि संस्कृति, इतिहास, साहित्य, विचारधाराओं और आंदोलनों का जीवंत इतिहास है। चाहे वह शिव युग की युद्ध रणनीति हो, संतों के ग्रंथों की आध्यात्मिकता हो, या लोकमान्य तिलक और सावरकर की रचनाओं में क्रांति की गर्जना हो – मराठी ने हर युग में अपनी छाप छोड़ी है। आज भी यह भाषा डिजिटल युग में नए स्थान तलाश रही है तथा व्यापक रूप ले रही है।
मराठी भाषा की समृद्धि की नींव संतों ने रखी थी। संत ज्ञानेश्वर ने गीता के दर्शन को संस्कृत से मराठी में लाकर ज्ञानेश्वरी की रचना की। मराठी का महत्व समझाते हुए संत ज्ञानेश्वर ने गर्व से कहा, “मेरी मराठी भाषा में बोलो, और तुम अमृत पर भी शर्त जीत जाओगे!” संत तुकाराम की कविताओं में सामुदायिकता की भावना पैदा करने की शक्ति है, जबकि समर्थ रामदास की रचनाओं में राष्ट्रीयता की चेतना है। इस संत वाणी ने न केवल धर्म का प्रसार किया, बल्कि मराठी जनमानस की सोच को भी एक नया आयाम दिया।

मराठी साहित्य सिर्फ पवित्र ग्रंथों तक ही सीमित नहीं है। सुरेश भट की ग़ज़लों, कीर्तन संस्कृति, लोक कथाओं से लेकर ऐतिहासिक जीवनियों, नाटकों से लेकर विज्ञान और प्रौद्योगिकी परंपराओं तक मराठी साहित्य ने विभिन्न पहलुओं में खुद को समृद्ध किया है। लोकमान्य तिलक के संपादकीय ने स्वतंत्रता संग्राम को गति दी, विष्णु शास्त्री चिपलूणकर ने मराठी साहित्य को नया जीवन दिया, जबकि प. एल देशपांडे ने अपनी कुशल लेखनी से मराठी को एक अलग ऊंचाई दी। बनाम एस. खांडेकर, रणजीत देसाई और शिवाजी सावंत के साहित्य ने इतिहास और समकालीन सामाजिक जीवन की एक दृष्टि निर्मित की। यह उल्लेखनीय है कि आज मराठी साहित्य नए रास्ते तलाश रहा है – किंडल तक पहुंच रहा है, पॉडकास्ट के माध्यम से सुना जा रहा है और सोशल मीडिया पर चर्चा हो रही है।
इस वर्ष 98वां अखिल भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलन दिल्ली में आयोजित किया जा रहा है और यह सम्मेलन कई कारणों से ऐतिहासिक महत्व रखता है। केंद्र सरकार द्वारा मराठी को शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिए जाने के बाद यह पहला साहित्यिक सम्मेलन है। इसके अलावा, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा इसका उद्घाटन भी गौरवपूर्ण क्षण होगा। यह सम्मेलन भारत और विश्व भर के मराठी भाषियों के लिए प्रेरणादायी होगा।

मराठी भाषा न केवल अतीत का गौरव है, बल्कि भविष्य के लिए एक खजाना भी है। डिजिटल क्रांति के युग में भी मराठी साहित्य नए प्रयोगों के माध्यम से आगे बढ़ रहा है। ब्लॉग, पॉडकास्ट, ऑडियोबुक, वेब सीरीज – इन सभी माध्यमों से मराठी भाषा नई पीढ़ी तक पहुंच रही है। 98वां साहित्य सम्मेलन महज एक समारोह नहीं, बल्कि मराठी के उज्ज्वल भविष्य का संकल्प है। हम सभी को इस भाषा को संरक्षित करने, इसका सम्मान करने तथा इसके विकास में योगदान देने के लिए मिलकर काम करना चाहिए। तो, आइए हम अपनी मराठी भाषा की समृद्धि और उसके साहित्य की भव्यता के इस उत्सव का जश्न मनाएं!






