महायुति में ‘कंफ्यूजन’, विपक्ष को मिला ‘ब्रह्मास्त्र’…हिंदी विवाद से बदलेगा महाराष्ट्र का समीकरण

Hindi Controversy: महाराष्ट्र में इन दिनों हिंदी बाषा पर विवाद बढ़ता जाता रहा है। इस मुद्दे को लेकर राज ठाकरे और उद्धव साथ आने तक को तैयार हैं। आइए जानते हैं कि इस मुद्दे से महाराष्ट्र में राजनीतिक समीकरण कितना बदलेगा...
महायुति में ‘कंफ्यूजन’, विपक्ष को मिला ‘ब्रह्मास्त्र’…हिंदी विवाद से बदलेगा महाराष्ट्र का समीकरण
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नवभारत डेस्क: महाराष्ट्र सरकार द्वारा नई शिक्षा नीति (NEP) के तहत कक्षा एक से पांच तक हिंदी को तीसरी भाषा के रूप में अनिवार्य करने के फैसले ने राज्य की राजनीति में बवाल खड़ा कर दिया है। ये फैसला भले ही शिक्षा नीति से जुड़ा है; लेकिन इसके नाम पर मराठी अस्मिता, संघीय ढांचे, तथा आगामी निकाय चुनावों की पूरी बिसात बिछाने की तैयारी शुरू हो गई है। विपक्षी महा विकास अघाड़ी (MVA) को विधानसभा चुनावों मे मिला हार के बाद बाजी पलटने का इससे बेहतर मौका नहीं दिख रहा है। महाराष्ट्र के आम लोगों को इस फैसले से क्या फर्क पड़ने वाला है, फिलहाल इसका तो कोई सर्वे नहीं हुआ है, लेकिन एमवीए इसे बीएमसी (BMC) समेत आने वाले सभी निकाय चुनावों में मुद्दा बनाना चाहता है।

शुरू से ही यह साफ तौर पर देखा गया है कि महाराष्ट्र में हिंदी विरोध का स्वर दक्षिण भारत जैसा न तो तीव्र है और न ही हो सकता है। इसका मुख्य कारण ये है कि प्रदेश के विदर्भ और मराठवाड़ा जैसे इलाकों में हिंदी भाषी आबादी का बड़ा हिस्सा रहता है। लेकिन, जब बात 'मराठी अस्मिता' की होती है, तो इस मुद्दे को भावनात्मक बनाने का कोई कसर नहीं छोड़ा जाने वाला है। इसको हिंदी विरोध से कम, मराठी की उपेक्षा साबित करने की ज्यादा कोशिश हो रही है। इसके पीछे महाराष्ट्र का सियासी इतिहास भी है।

मराठी मानुष का मुद्दा भावनात्मक

1950 के दशक में शुरू हुआ 'संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन' और 1966 में बाल ठाकरे की शिवसेना की स्थापना, ये दोनों मराठी पहचान को मजबूत करने के लिए ही हुए थे। शिवसेना ने ‘मराठी माणूस’ को अपना मुद्दा बनाया था। चाहे नौकरियों में हिस्सेदारी हो या फिर साइनबोर्ड की भाषा। ऐसे में आज सरकार जो कदम उठा चुकी है, उसे लोगों को ये बताने के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश हो रही है कि मराठी भाषा के दबदबे को कम करने की चाल है। ऐसा करने वालों को भरोसा है कि ऐसा होने पर विरोध होना तो स्वाभाविक है।

बदलेंगे राजनीति के समीकरण

इस फैसले का ऐलान ऐसे वक्त में हुआ है, जब आने वाले महीनों में मुंबई महानगरपालिका (BMC) सहित राज्य भर में निकाय चुनाव होने वाले हैं। ऐसे में ये केवल शिक्षा नीति नहीं, बल्कि राजनीति का एक हथकंडा भी बन सकता है। आइए समझने की कोशिश करते हैं कि किस राजनीतिक दल के लिए ये फैसला किस तरह से मायने रखता है:

1. महायुति में कंफ्यूजन

भाजपा, उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की शिवसेना और डिप्टी सीएम अजित पवार वाली एनसीपी की महायुति सरकार ने ये फैसला लिया है। लेकिन, विरोध शुरू होने के बाद लगता है कि ये फैसला उनके लिए गले की हड्डी बन सकता है। सीएम देवेंद्र फडणवीस ने एक तरफ 'पूरे देश में एक भाषा की जरूरत' की बात की, तो दूसरी ओर 'मराठी आनी ही चाहिए' का भी दम भर रहे हैं। यह रणनीति दरअसल दोनों भाषाई समुदायों, मराठी तथा हिंदी भाषियों को एक साथ संतुष्ट करने की कोशिश है। लेकिन, ये दांव लोकल चुनावों में कितना असरदार हो सकेगा, ये एक बड़ा सवाल है।

2.शिवसेना में अंतर्विरोध

एकनाथ शिंदे की शिवसेना जिसकी नींव ही 'मराठी माणूष' के नाम पर पड़ी थी, अब सरकार का हिस्सा होने के नाते इस विवाद में उलझ सकती है। यह उनके लिए सबसे पेचीदा स्थिति है। उद्धव ठाकरे इसी मुद्दे पर हमला बोल रहे हैं, वो शिंदे की 'मराठी वाली नस' को दबाना चाहते हैं, जिसकी ताक में वो पिछले लगभग तीन साल से लगे हुए हैं।

3. राज ठाकरे की अस्तित्व बचाने की लड़ाई

एमएनएस प्रमुख राज ठाकरे इस मुद्दे पर सबसे आक्रामक हैं। उनका संदेश साफ है, मराठी के नाम पर हिंदी थोपना किसी भी हाल में मंजूर नहीं। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना को अब जाकर एक मुद्दा मिला है, जिससे वो खुद को पुनर्जीवित करने की कोशिश कर सकती है। ये मुद्दा उसका पारंपरिक 'मराठी पहले' एजेंडे से मेल खाता है, और BMC चुनाव से पहले राज को एक नया मंच मिल सकता है।

4. कांग्रेस और MVA की रणनीति

कांग्रेस और उद्धव ठाकरे की शिवसेना (UBT) इस मसले पर एकजुट दिख रहे हैं। कांग्रेस नेता विजय वडेट्टीवार ने कहा है कि 'ये मराठी पर हमला है और राज्य के अधिकारों का हनन है।' उनके अनुसार यह सिर्फ भाषा नहीं, बल्कि केंद्र बनाम राज्य की लड़ाई है। कुल मिलाकर एमवीए के पास अभी खोने के लिए तो कुछ बचा नहीं है और बीएमसी को बचाने के लिए फिलहाल इससे बड़ा मुद्दा नहीं रहा है।

5.अजित पवार की चाल सधी हुई

एनसीपी प्रमुख अजित पवार ने हल्के-फुल्के अंदाज में राज ठाकरे पर तंज कसते हुए कहा है कि 'कुछ लोगों के पास काम नहीं है।' पवार बचाव की मुद्रा में दिख रहे हैं और सरकार के फैसले का समर्थन भी कर रहे हैं। उनकी पार्टी महाराष्ट्र से बाहर भी अपनी संभावनाओं को खराब नहीं करना चाहती। राजनीतिक खबरों को पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें

संघीय ढांचे से जुड़ा है सवाल

त्रिभाषा नीति पर बहस केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन पहले ही भाषा को संघीय ढांचे का केंद्र बता चुके हैं। अब महाराष्ट्र में भी ये भावना उभारने की कोशिश हो रही है कि केंद्र राज्यों पर हिंदी भाषा थोप रहा है। अब इस मामले से बड़ा सवाल उठ रहा है कि क्या ऐसे मुद्दे से राज्यों और केंद्र में समन्वय बन सकता है।

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