बिरसी फाटा / तिरोडा. भारत कृषि प्रधान देश है. कृषि कार्य में बैलों का महत्वपूर्ण योगदान होता है. बैलों के प्रति कृतज्ञाता पूर्वक पूजन का त्योहार है. पिछले वर्ष की तरह इस वर्ष भी कोरोना संकट ने पोला उत्सव पर पानी फेर दिया. शहरों की तुलना गावों में इसका विशेष महत्व है.
प्रतिवर्ष ग्रामीण क्षेत्र में धूमधाम से मनाया जाने वाला पोला पर्व इस बार भी प्रशासन द्वारा जारी निर्देश का पालन करते हुए ग्राम बिरसी, लाखेगांव, बोपेसर, विहिरगांव व परिसर के गावों में यह त्योहार सादगी पूर्वक मनाया गया. पिछले वर्ष की तरह इस वर्ष भी सार्वजनिक आयोजन नही किया गया. बैलों की घरों में पूजा की गई.
इस दौरान बैलों का आकर्षक श्रृंगार भी किया गया. पिछले अनेक बरसों की परंपरा के अनुसार गांव के मैदान पर तोरन लगाई जाती थी जिसका पूजन गांव के पुलिस पाटील के द्वारा गाजे-बाजे से किया जाता था जिसके बाद बैल जोडियों द्वारा तोरण तोड़ी जाती थी. इस दौरान बैल ही बैल नजर आते थे.
रंग बिरंगे सजे हुए बैलों से पूरा मैदान रंगा हुआ लगता था तथा बैलों की घंटियां पूरे गाव में गूंजती थी. शाम को बैल जोडिय़ों को पकवान खिलाकर पूजन किया जाता था. लेकिन इस वर्ष सादगी पूर्वक पोला पर्व मनाया गया. सार्वजनिक पूजन नही हो सका जिस पर अनेक किसानों ने नाराजी व्यक्त की.
पोला पर्व पर गांव के मैदान पर लगाई गई तोरण तोड़कर उसका एक हिस्सा अपने पास रखने की भी परंपरा का निर्वहन इस वर्ष नहीं हो पाया. सार्वजनिक आयोजन नहीं होने से गांव के मैदान पर तोरण नहीं लगाई गई. उल्लेखनीय है कि मैदान पर तोरण टूटने के बाद उसका हिस्सा लूटने के लिए भीड़ लग जाती थी. जो इस बार देखने को नही मिली.
महाराष्ट्र की संस्कृति में पोले के बाद तान्हा (छोटा) पोला मनाया जाता है. गावों में तान्हा पोले का आयोजन भी किया जाता है. लेकिन इस वर्ष भी प्रशासन के निर्देश का पालन करते हुए तान्हा पोले का आयोजन नही किया गया. इस दिन छोटे बच्चे अपना नंदी बैल लेकर घर घर घूमते हैं और लकड़ी के बैलों की पूजा कराते हैं.
ग्रामीण क्षेत्र में बच्चों का तान्हा पोला भी कोरोना की भेंट चढ़ गया. पोला पर्व के दूसरे दिन तान्हा पोला को लेकर बच्चों में उत्साह रहता था. इस बार ऐसा देखने को नहीं मिला. हर साल तान्हा पोला पर सुबह से बच्चे हाथों में लकड़ी से बने बैलों को लेकर घर-घर पहुंचते थे. बच्चे घरों में जाकर नंदी के पूजन के लिए आवाज लगाते थे. इस बार लोग बच्चों के आने का इंतजार करते रहे लेकिन बच्चे लकड़ी के बैलों का पूजन कराने नहीं पहुंचे.