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गोंदिया में ग्राम पंचायतें विकास ठप, योजनाएं कागजों में सिमटीं, जागरूकता की कमी से गांव बने राजनीति का अड्डा
- Written By: रूपम सिंह
Gondia News: गोंदिया की 556 ग्राम पंचायतों में ग्रामसेवकों की मुख्यालय से अनुपस्थिति के कारण विकास कार्य ठप हैं। राजनीति और गुटबाजी के चलते ग्राम स्वराज की अवधारणा कमजोर हो रही है।

प्रतीकात्मक तस्वीर ( सोर्स: सोशल मीडिया)
Gondia Rural Development News: गोंदिया जिले में 556 से अधिक ग्राम पंचायतें हैं और इन ग्राम पंचायतों के कामकाज के प्रबंधन के लिए सरकार द्वारा नियुक्त ग्रामसेवक और ग्राम विकास अधिकारी हैं। लेकिन मुख्यालय पर कोई भी ग्राम विकास अधिकारी या ग्राम सेवक न रहने के कारण ग्राम विकास के मंदिर कहे जाने वाली ग्राम पंचायतें विकास से वंचित रह रही हैं।
गांव के स्वयंभू नेता, सरपंच व विरोधी गुट के नेताओं को आपस में भीड़ा कर ग्रामसेवक अपने काम निकाल रहे है। वे मुख्यालय को छोड़कर तहसील या जिला स्तर पर रहकर ग्रामीण विकास के मामलों को चला रहे हैं। इसलिए, प्रगतिशील विकास की संकल्पना को कमजोर किया जा रहा है। गांवों में हृदय विदारक तस्वीर है कि आदर्श गांव, खुले में शौच मुक्त और गांव स्वच्छता अभियान की ओर अब अनदेखी की जा रही है।
किसी भी गांव के विकास में ग्राम पंचायत एक महत्वपूर्ण कारक होती है, लेकिन ग्राम विकास के ये मंदिर आज राजनीति का अड्डा बन गए हैं। गांवों में गुटबाजी की राजनीति जोर पकड़ने लगी और गांव हिंसा की चपेट में आ गया। क्योंकि गांव में कोई रोजगार उपलब्ध नहीं है, इसलिए गांव के लोग शहर जा रहे है। ऐसा प्रतीत होता है कि राजनेता, प्रशासन में ग्राम सेवक और नागरिक, इस पूरी प्रक्रिया के लिए जिम्मेदार हैं। ऐसा लगता है कि ग्रामीणों को अपने मूल अधिकारों की जानकारी नहीं है। यदि कोई अन्य आवाज उठती है तो उसकी आवाज को व्यवस्थित ढंग से दबा दिया जाता है।
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महाराष्ट्र में ग्राम पंचायत को अपनाया गया। क्योंकि सच्चा भारत गांवों में दिखता है, इसलिए राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने ‘चलो गांव की ओर’ का आह्वान किया, जो ग्रामीण जन-जीवन से जुड़ा है और उन्होंने ग्रामस्वराज की अवधारणा प्रस्तुत की। जिसमें ग्रामीण क्षेत्रों का सशक्तिकरण एक महत्वपूर्ण उद्देश्य था।
आज भी इस अभिनव अभियान की उपयोगिता महसूस की जा रही है और गांधीजी का यह मूल मंत्र शहर की बढ़ती रोजगार समस्या और बढ़ती भीड़भाड़ से उत्पन्न आर्थिक समस्या के समाधान का रास्ता सुझाता है। कृषि और ग्रामीण क्षेत्रों में उत्पादकता, निवेश और रोजगार सृजन का महत्व इन कारकों से स्पष्ट है। गांधीजी ने स्वतंत्रता-पूर्व काल में कहा था कि प्रत्येक गांव को आत्मनिर्भर होना चाहिए और प्राथमिक विकास के लिए सचेत प्रयास किए जाने चाहिए।
योजनाओं के बारे में जागरूकता आवश्यक
सरकार आदर्श गांव, सांसद ग्राम योजना, शौच मुक्त गांव, स्वच्छता अभियान जैसी विभिन्न योजनाएं लागू करती है। इसके परिणामस्वरूप राज्य में कई आदर्श गांवों का निर्माण हुआ। कई गांवों ने उनके उदाहरण का अनुसरण किया और अपने गांवों में विकास हासिल किया। लेकिन, कई गांव ऐसे हैं जहां ये योजनाएं केवल कागजों पर ही मौजूद हैं। स्थानीय राजनीति और तुगलक प्रशासन के कारण, जिसने ग्राम सेवकों के मुख्यालयों को नष्ट कर दिया, योजनाएं कागजों तक ही सीमित रह गई। ऐसा लगता है कि इसके बारे में अभी भी कोई जागरूकता नहीं है।
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अपने मौलिक अधिकारों के प्रति जागरूक होना जरूरी
यदि नागरिक अपने मौलिक अधिकारों के प्रति जागरूक होंगे तभी ग्राम पंचायतें पुनः बुनियादी विकास के मंदिर बन सकेंगी। तत्कालीन मुख्यमंत्री वसंतराव नाईक समिति की सिफारिशों को ध्यान में रखते हुए, महाराष्ट्र सरकार ने महाराष्ट्र जिला परिषद और पंचायत समिति अधिनियम, 1961 पारित किया और 1 मई 1962 से जिला परिषद, पंचायत समिति और की त्रिस्तरीय पंचायत राज व्यवस्था लागू हुई।
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