पहले तनातनी, अब हाथ मिलाने की तैयारी! ट्रम्प और शी जिनपिंग की मुलाकात से क्या बदलेगा खेल?

Trump Xi Beijing Summit: राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप 14-15 मई को चीन के ऐतिहासिक दौरे पर जा रहे हैं। ईरान युद्ध और बढ़ते व्यापार घाटे के बीच होने वाली इस शिखर वार्ता पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हैं।
First Tensions, Now Preparing to Shake Hands! How Will the Trump-Xi Jinping Meeting Change the Game?
ट्रंप और शी जिनपिंग, फोटो (सो. सोशल मीडिया)
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US China Trade Deficit Trump Xi Beijing Summit: ट्रम्प का चीन दौरा, ऐतिहासिक तो होगा, लेकिन अमेरिका और चीन के संबंधों पर जमी बर्फ कितनी पिघलेगी, इसका अनुमान अभी कोई लगाने की स्थिति में नहीं है। अगले हफ्ते 14-15 मई को ट्रम्प और शी जिनपिंग कई बार हाथ मिलाएंगे, पर क्या दिल भी मिलेंगे यह कहना मुश्किल है। कारण दोनों महाशक्तियों के बीच अनबन और अविश्वास की एक लंबी दास्तां है।

इस एक दौरे से सारे मतभेद सुलझ जाएंगे?

इसकी उम्मीद कोई नहीं कर कर रहा है। फिर भी इन दो शक्तिशाली देशों के राष्ट्राध्यक्षों को मिलते देख दुनिया भर के देशों को खुशी होगी क्योंकि, इनके झगड़ों से विश्व व्यवस्था को फ़ायदा कम नुकसान ज्यादा हो रहा है।

परदे के पीछे से ईरान की मदद

हालांकि राष्ट्रपति ट्रम्प का चीन दौरा ईरान के खिलाफ युद्ध की शुरुआत से बहुत पहले तय हो गया था, वह मार्च के अंतिम सप्ताह में ही चीन जाने वाले थे, लेकिन इस युद्ध ने अमेरिकी राष्ट्रपति के चीन दौरे को दो हफ्ते टाल दिए। अब यही ईरान-अमेरिका युद्ध ट्रम्प और शी जिनपिंग के बीच वार्ता का बड़ा मुद्दा बनने वाला है। अमेरिकियों को लगता है कि चीन परदे के पीछे से ईरान की मदद कर रहा है और बदले में लाखों गैलन तेल का चोरी छिपे आपूर्ति ले रहा है। यही नहीं राष्ट्रपति ट्रम्प ने स्ट्रेट ऑफ हर्मुज खुलवाने के ऑपरेशन में चीन से शामिल होने का खुद आग्रह किया था, लेकिन बीजिंग ने कोई सहयोग नहीं दिया, बल्कि जब अमेरिका ने हर्मुज के आस पास समुद्री गलियारे को जाम करना शुरू किया तो चीन ने खुल कर उसपर आपत्ति जताई थी। ईरान के बारे में दोनों विश्व नेताओं के बीच क्या तय करते हैं, यह देखना दिलचस्प होगा। इधर ईरान के विदेश मंत्री ने चीन का दौरा कर अपनी स्थिति से शी जिनपिंग को अवगत कर दी है।

US ने लगाया चीनी कंपनियो पर बैन

अब एक और खबर ने ट्रम्प के चीन दौरे की सफलता पर संदेह की निशान लगा दी है। अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने 8 मई को 10 लोगों और कंपनियों पर एक प्रतिबंधों की घोषणा की, जिन पर ईरान को ड्रोन टेक्नॉलजी या हथियार बनाने के सामान देने का आरोप है। उनमें चीन हांगकांग की भी कंपनियां शामिल हैं। आरोप कि इन इकाइयों ने ईरान को ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइल बनाने में मदद की है और अब भी कर रहे हैं । चीन ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया जताई है और साफ कहा है कि अमेरिका ने प्रतिबंध की कारवाई अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर की है। बीजिंग ने तो यहां तक कह दिया है कि ऐसे प्रतिबंधों की परवाह किये बिना चीनी कंपनियां अपने वैध अधिकारों का उपयोग करती रहेंगी। चीन के रुख में कोई बदलाव नहीं आएगा।

पेट्रोलियम पदार्थ खरीदने पर प्रतिबंध

सेंटर फॉर चाइना एंड जेशन के फेलो ही वेइवेन के हवाले से ग्लोबल टाइम्स ने लिखा कि चीन और ईरान दो संप्रभु देश हैं और वे सामान्य व्यापार करते रहेंगे। अमेरिका के प्रतिबंध का कोई कानूनी कोई आधार नहीं है। केवल संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ही कोई प्रतिबंध प्रस्ताव कर सकता है। इसके पहले भी अमेरिका ने पांच चीनी कंपनियों के खिलाफ ईरान से गुपचुप तरीके से पेट्रोलियम पदार्थ खरीदने पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की थी, उसे भी चीन ने मानने से इनकार कर दिया था।

कई मुद्दों पर अमेरिका से होगी बात

पहले से ही वाशिंगटन और बीजिंग व्यापार असंतुलन और टैरिफ पर मुद्दे उलझे हुए हैं। इस मामले में ट्रम्प अपने पहले कार्यकाल से ही चीन के खिलाफ आक्रामक रहे हैं। 2018 में चीन पर जो अतिरिक्त टैरिफ ट्रम्प ने ही लगाए थे, जिसे राष्ट्रपति बाइडेन ने भी बरकरार रखा। दूसरे कार्यकाल में भी ट्रम्प चाहते हैं कि चीन अमेरिकी प्रस्तावों को माने, रेयर अर्थ प्रदान करें, अमेरिकी कृषि उत्पादों की खरीद का करार करे और आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल रक्षा उपकरणों में एक सीमा से ज्यादा ना करे और अपने बाजार अमेरिकी उत्पादों के लिए खोल दे। लेकिन चीन सब मांगें आसानी से मान लेगा और ट्रम्प विजयी मुद्रा में बीजिंग से वाशिंगटन लौट आएंगे ऐसा होता दिखाई नहीं दे रहा है। चीन के अपने कई मुद्दे हैं जिन पर वह अमेरिका से खुल कर बात करने वाला है।

चीन की सबसे बड़ी चिंता

मेनलैंड चीन की यूएस से सबसे बड़ी शिकायत ताइवान में अमेरिकी दखल को लेकर है। ताइवान को अमेरिका ना सिर्फ असलहे और लड़ाकू विमान की लगातार आपूर्ति दे रहा है, बल्कि राजनयिक संबंध भी बनाए हुए है। यह बीजिंग के वन चाइना पॉलिसी का खुला उल्लंघन है। चीन इस मामले में लगातार ताइवान को धमकाता भी रहता है, और कई बार अमेरिका के साथ सीधे टकराव की बात भी करता रहा है। ट्रम्प के इस दौरे में चीन इस मुद्दे पर कोई ठोस बात चीत की तैयारी कर रहा है।

US China trade
अमेरिका-चीन व्यापार फोटो (सो. मीडिया)

शी जिनपिंग को यह ताइवान के मुद्दे को सुलझाने और उस पर मेनलैंड द्वारा कब्जा करने का यह उपयुक्त अवसर लगता है। ईरान और वेनेज़ुएला पर अमेरिका की एकतरफा कारवाई के बाद ट्रम्प किसी देश की संप्रभूता का सम्मान करने की नैतिक दुहाई नहीं दे सकते और वह इस समय चीन के साथ किसी संभावित युद्ध की सोंच भी नहीं सकते। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्क रुबियो ने यह माना भी है कि चीन की तरफ से ताइवान को लेकर टफ सवाल आएंगे।

सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार बना चीन

यह सही है कि पिछले कुछ दशकों में चीन, अमेरिका का सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार बन गया है। चीन इस समय अमेरिकी बाजार का सबसे बड़ा निर्यातक भी है। टेक्नोलोजी और ऑटोमेशन क्षेत्र की अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपनी उत्पादन इकाई चीन स्थानांतरित कर चुकी हैं, इससे अमेरिकियों के लिए नौकरियां भी कम होती जा रही हैं।

ट्रम्प अपने पहले कार्यकाल की तरह इस बार भी चीन की ट्रेड पॉलिसी को इसके लिए सबसे बड़ा कारण बताते हैं। उनका कहना है कि चीन बहुत कम शुल्क देकर अमेरिका में अपना सामान तो भेज देता है, लेकिन अमेरिका से आने वाले सामानों पर भारी शुल्क लगाता है। अपनी इसी बात को सही सिद्ध करने के लिए ट्रम्प ने पिछले दिनों चीन पर 145 प्रतिशत तक टैरिफ लगा दिया था, लेकिन अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति के इमर्जेंसी के आधार पर मनमाने टैरिफ लगाने के अधिकार को समाप्त कर दिया और चीन फिलहाल हाई टैरिफ से बचा हुआ है।

ट्रम्प डाल रहे चीन पर दबाव

इस समय चीन और अमेरिका के बीच लगभग 400 बिलियन डॉलर से अधिक का कारोबार है, लेकिन इसमें से चीन 308 बिलियन डॉलर से अधिक का निर्यात अमेरिका को करता है और अमेरिका से केवल 100 बिलियन डॉलर के आस पास का माल खरीदता है। इस तरह अमेरिका को 202 बिलियन डॉलर से अधिक का व्यापार घाटा चीन दे रहा है।

इस खाई को पाटने के लिए ही ट्रम्प बहुत सारा व्यापारिक दबाव चीन पर डाल रहे हैं। खासकर एआई से जुड़ी टेक्नॉलजी, सेमीकंडक्टर चिप के निर्यात पर प्रतिबंध और चीनी टेक्नॉलजी कंपनियों को अमेरिकी बाजार में छूट देने की मनाही जैसे कदम पहले ही उठा लिए गए हैं। अब देखना है कि यूएस चीन के राष्ट्राध्यक्षों के बीच इस शिखर वार्ता से गतिरोध के कौन कौन से दरवाजे खुलते हैं।

नवभारत लाइव के लिए विक्रम उपाध्याय की रिपोर्ट--

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